अरी ओ ओरियल!
उस प्रकम्पित शाख़ की धड़कन को
हम दोनों ही महसूस करते हैं एक साथ-
जिस पर तू बैठी है चित्रलिखित!
मत भूल
कि उसी पेड़ की जड़ें
मेरे पैरों के नीचे से होकर जाती हैं।
हम दोनों ही समझते हैं
कि आकाश और सागर के
विस्तार को नापती यह लाली
सूर्य की वह लाली नहीं
जिसमें रोज़ नहाकर
तू हल्दी और कुंकुम के
अपूर्व सौन्दर्य से भर जाती थी
हम दोनों को ही समझ लेना चाहिए
कि वादियों से चली आ रही
जलते चिनारों की गन्ध
और संगीनों की दस्तक
ज़हरीले झाग की तरह ठहर गयी है
हमारे सीने में।
सिर्फ़ आज कल या परसों के लिए नहीं।
ज्वार में ऊँचे तक
साँप के फन की तरह
लहराने वाले सागर की तरह
सिर धुनती है फ़िज़ाएँ,
जिस तरह देखते-देखते
बहता चला आता है पानी,
लील चुका है
अनेक युगों का
अनेक पीढ़ियों का
अनेक दुःस्वप्नों का शाप!
नहीं तो क्यों रातों रात
कोई साया हमारे बीच गुज़रा
और सुबह उसकी छाया
दिखने लगी हम दोनों की आँखों में?
नहीं तो क्यों
हमारे होंठों में होती है जुम्बिश,
दिलों में उठते हैं सैलाब,
या कोई मामूली सी आहट
निचोड़ लेती है धड़कन को!
क्यों लोगों के बीच की बहस
पतंग-सी कट कर रह जाती है
बीच आकाश में।
क्यों सवाल
दैत्यों का आकार ले लेते हैं
और जवाब कतराने लगते हैं
ख़ुद से।
अरी ओ ओरियल!
अपनी-अपनी शाख़ पर स्थित
हम दोनों ने की है
एक साथ कई बार
अनेक स्वप्न प्रदेशों की यात्राएँ
चलो प्रतीक्षा करें
इस मौसम के चुपचाप
गुज़र जाने का
जिसमें डर है मुझे
आकाश में मँडराते अग्निबाणों से
तुम्हारे पंखों के झुलस जाने का।
वीणा सिंह
उस प्रकम्पित शाख़ की धड़कन को
हम दोनों ही महसूस करते हैं एक साथ-
जिस पर तू बैठी है चित्रलिखित!
मत भूल
कि उसी पेड़ की जड़ें
मेरे पैरों के नीचे से होकर जाती हैं।
हम दोनों ही समझते हैं
कि आकाश और सागर के
विस्तार को नापती यह लाली
सूर्य की वह लाली नहीं
जिसमें रोज़ नहाकर
तू हल्दी और कुंकुम के
अपूर्व सौन्दर्य से भर जाती थी
हम दोनों को ही समझ लेना चाहिए
कि वादियों से चली आ रही
जलते चिनारों की गन्ध
और संगीनों की दस्तक
ज़हरीले झाग की तरह ठहर गयी है
हमारे सीने में।
सिर्फ़ आज कल या परसों के लिए नहीं।
ज्वार में ऊँचे तक
साँप के फन की तरह
लहराने वाले सागर की तरह
सिर धुनती है फ़िज़ाएँ,
जिस तरह देखते-देखते
बहता चला आता है पानी,
लील चुका है
अनेक युगों का
अनेक पीढ़ियों का
अनेक दुःस्वप्नों का शाप!
नहीं तो क्यों रातों रात
कोई साया हमारे बीच गुज़रा
और सुबह उसकी छाया
दिखने लगी हम दोनों की आँखों में?
नहीं तो क्यों
हमारे होंठों में होती है जुम्बिश,
दिलों में उठते हैं सैलाब,
या कोई मामूली सी आहट
निचोड़ लेती है धड़कन को!
क्यों लोगों के बीच की बहस
पतंग-सी कट कर रह जाती है
बीच आकाश में।
क्यों सवाल
दैत्यों का आकार ले लेते हैं
और जवाब कतराने लगते हैं
ख़ुद से।
अरी ओ ओरियल!
अपनी-अपनी शाख़ पर स्थित
हम दोनों ने की है
एक साथ कई बार
अनेक स्वप्न प्रदेशों की यात्राएँ
चलो प्रतीक्षा करें
इस मौसम के चुपचाप
गुज़र जाने का
जिसमें डर है मुझे
आकाश में मँडराते अग्निबाणों से
तुम्हारे पंखों के झुलस जाने का।
वीणा सिंह
No comments:
Post a Comment