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Saturday, September 29, 2018

हरकारा


उस दिन जैसे एक हरकारा
भरी दुपहरी आया हो
भूले भटके बिन आहट के
पाती मेरी लाया हो

किसी दुर्ग के अभ्यंतर में 
जलते-बुझते दीप सी
व्यग्र गरजते सागर तट पर 
पड़ी हुई एक सीप सी

मलय गंध में बहती-तिरती
अबूझ नेह लिपटी फिरती
कथा अदेखी किस दुनिया की
कानों में कहती -फिरती

सघन व्यस्त जंजाल भरे दिन
उलझन कितनी रातों की
अनियारे बेचैन स्वप्न सी
क़िस्से ब्यौरे बातों की

किन राहों में घूमी-भटकी
अनजान यायावर थी
कई ऋतुओं की गंध लिए
बैठी देहरी थककर थी

धूसर मलिन वस्त्र पड़े थे
विगत दिनों के हस्ताक्षर
कटु तिक्त मधुरिम पल वाली
कथा-व्यथा अंकित मिलकर

बस उन छोटे मौन पलों में
चित्र-पटी सी चल निकली
मन के आँगन बँधी रही थी
राह ढूँढती निकल चली

अवगुंठन की डोर बँधी जो
शिथिल भाव से काँधे से
आकाश-कुसुम सी झर निकली
रोके न रुकी फिर बाँधे से

वीणा सिंह