Saturday, May 21, 2011

कठकरेजा

जाली  की सुतली की बुनी हुई खाट पर 
औंधे मुंह लेटा है ओरचन की पाट पर
आसमान की गोद से है जी अनसा गया 
या किस्से -कहानी का मौसम है आ गया

आवारा लड़के सा डोल-डोल रात भर
मुंह फुला बैठा है जाने किस बात पर 
गुमसुम सा उलझा है जाली के जाल से 
बाज आया चाँद भी ऐसे जंजाल से

 पर्वत वन नदी ताल पहले तो दौड़ाया
अब इतनी देर में लगता है प्यार आया
जुगनुओं की फ़ौज को मनाने  को भेजा है
आसमाँ भी ख़ूब है,कैसा कठकरेजा है।

वीणा सिंह 



खंडाला

घाटियों के बीच से
हरीतिमा की नदी बहती है
जादू की नदी अस्फुट मन्त्र कहती है.
पुरानी कहानी है
हर रात यहाँ कुछ नया होता आया है
मन्त्र के स्वर में बिंधा हुआ
आविष्ट भाव से डोलता
प्रवाह में खिंचा चला आया है 
एक   पीला पत्ता  -
इस्पात की खुरचनें समेटे 
पूरी तैयारी है 
रात सुवासित है --
फूल से, ताजगी से
धरती ने पहने
लाल श्वेत फूलों के गजरे 
चाँद है, रहस्य है, नमी है
बस एक क्षण और
धीरे-धीरे वह   
इस्पात  की केंचुल उतार डालेगा 
और मिटटी  की आर्द्रता को छूकर 
हरा हो जाएगा.  

वीणा सिंह

राहिल की पार्टी

पीपल के पेड़ पर चिडियों का राज
राहिल तुम्हारी पार्टी है आज
कौवों ने चिल्ला के तुमको जगाया
थोडी देर बाद वह खिड़की पर आया
" सबकी है तैयारी राहिल नहीं जागा ?"
"जल्दी में आज हूँ "_कहकर वह भागा

बार्बिट ने पहने हैं हरे हरे कोट
लाल टाई डाल छुपा पत्तों की ओट

गौरैयों को अपना रिंग टोन न भाया
चूँ -चूँ और ची-ची का गाना लगाया

ओरियोल ने पहनी है पीली सी ड्रेस
उसमे लगाई है काली सी लेस

कबूतर तो गर्दन फुलाता हुआ नाचे
कबूतरी के सामने प्रेम कथा बांचे

सूरज की रोशनी आ आ के झांके
सागर भी मौज में चला इठलाके

मौसी गिलहरी तो सबसे है आगे
इधर उधर सीटियाँ बजाती हुई भागे

पीपल के पेड़ पर बड़ी धूम धाम
ऐसी जमी पार्टी की क्या कहें राम !

पत्तों की प्लेट पर शोर मचा तब
“सब कुछ अरेंज्ड है , खाना दो अब”

“रुको - रुको अभी तो है मेन गेस्ट को आना”
वही तो है बेस्ट कहे सारा ज़माना
उसके आने पर रंग होगा और
जैसे बरसात में झूमे है मोर
सबने बनाया है मेन गेस्ट जिसको
हम भी तो देख लें कुर्सी दी किसको
जिसके आने पर रंग होगा और
अरे भाई किंगफिशर हम सबका मौर
सुनते ही पार्टी में नयी जान आयी
चलो भाई राहिल अब पार्टी रंग लाई

वीणा  सिंह

बरसता दिन है बारिश की नमी है




बरसता दिन है बारिश की नमी है

भीगे फूलों में लिपटी सी जमीन है

चलो इनसे भी कोई बात कर लें ।

खिड़की के बंद शीशे पार उनके

एक लता छुईमुई सी चुपके चुपके

दस्तक देती है मुलाकात कर लें ।

यों ही कमरे में हम चुपचाप बैठें

आँखें मूँद कुछ खोये से लेटें

चलें हम आज ख़ुद से बात कर लें ।

मुद्दतें हो गयीं परियों के किस्से

जो कल तक सब रहे हमारे हिस्से

उन्हें ढूंढे कोई ऐसी रात कर लें ।


वीणा सिंह 


आदिम पुत्र

हे आदिम पुत्र !
पर्वतों के विशाल कैनवास पर
श्रम भार से दुहरी पीठ किए
तुम सदा लगे मौन योगी से
कभी अपने ओसारे में धान फैलाते
कभी परिक्रमा में पीपल के
धर्म के सूत्र से बंधते ,
किसी पौराणिक कथा को बांचते ।
कभी लौह खंड सा प्रकाशमान
अग्नि - वीथिका को पिघलाते ।
संस्कारों की मुहर लगाते ,
बलि देने को उठे हाथ
प्रत्यंचा के साथ खिंचा
भ्रू -कुंचित तुम्हारा मुख !
वर्षों दुहराते रहे तुम
धर्म और क्रांति की गाथा ,
कभी शाल्मल - वृक्ष और बांसों की झुरमुट से
आती मांदल की थाप ,
अनबुझ गीत और पावों की थिरकन -
खींच लाती थी तुम्हारे पास ,
पल भर को बाँध ।
उसी एक क्षण
किसी प्रखर प्रकाश तले
अपरिचय के वलय गूँथ जाते थे साथ
लय और गान की आवृत्ति में
जुड़ जाते थे हाथ !
हालांकि तुम हंस पड़ते अक्सर
मेरे पैरों की अनाडी चाप पर ।
हे आदिम पुत्र !
स्वर्ण रेखा की धारा के साथ
करवट बदल ली है कई दशकों ने
लेकिन आज भी
बालों में सफेदी लिए और श्रम भार से झुके
तुम हो वैसे ही ।
कभी दो - चार सालों में
अचानक किसी गली में बोल उठता है
हमारे मुख का मौन स्मित ।
लगता है अभी प्रतिध्वनित होगी मांदल की थाप
बालों में बंधे पंखों की सरसराहट ,
वंश -वन के पीछे से बांसुरी की धुन .
लेकिन सुवर्ण- रेखा की छाती का ताप
कल्लौंछ बन के पसर गया है ।
तभी तो बज उठती है
हर तीज -त्यौहार पर कोई विदेशी धुन
तुम्हारे अपने ही दालान में ।
क्यों न संजो पाई तुम्हारे घर की मिटटी ,
अपनी ही धरोहर ?
बड़े हो गए हैं तुम्हारे बच्चे
पद और मर्यादा में
फिर भी आकाश को चुनौती देते
दैत्य की तरह ये काले पहाड़
मांगते हैं भीख
उसी पुरानी संस्कृति की ।
सुनो आदिम पुत्र !
ढूँढें हम दोनों फिर
उन रहस्यमय धुनों को ,
सुवर्ण रेखा की स्निग्ध धारा में सिक्त _
साथ देंगी ये मांदल की थाप का
आकाश के मौन चंदोवे के नीचे
ये इन पहाडों को मुखर कर देंगी .


वीणा सिंह

वे भी क्या दिन थे हम दर्द सुना करते थे

वे भी क्या दिन थे हम दर्द सुना करते थे
सपनों की आहट को साथ चुना करते थे
अब तो अनकही सब फिजां में ठहर जाती है
होठों से उठती है सीने में ही लहराती है
खुदा तेरी ज़मीं और आसमा का फासला क्यों है
तेरी रहमतों के बीच एक साया छुपा क्यों है
तेरी इस आजमाइश में कोई सजदे में झुक गया
तू उस बन्दे को राहत दे तो उसमें बुरा क्यों है .
 
 
 वीणा  सिंह

मत सोचो कि नीम उजली है तुम्हारी दुनिया

मत सोचो कि नीम उजली है तुम्हारी दुनिया
गिरह बंध जाए वो पहेली है तुम्हारी दुनिया
हाथ की छड़ी छूती है जब किनारों को
 उतरते ज्वार सी बह जाती है बाकी दुनिया ।
लोग बैठे  हैं ,नहीं भी मेरी महफ़िल में
उनकी महफ़िल में मैं हूँ कि नहीं सोचो क्यों
ठहर के देखो जिंदगी एक नासूर नहीं
जख्म को फूल में ढल जाने दो खरोंचो क्यों

हवा में यह वजूद जैसे गुमशुदा ख़त हो
काफी देर तक जिसका पता मिले न मिले
ओ़स की बूँद भी समंदर समाये बैठी है
बेवजह बात क्यों कि बाग़ फिर खिले न खिले
 न जाने कब तक संभालेंगे वक्त की किरचें
कदम की आहटों में ख़ाक उडेगी कब तक ?
मुझसे पूछो तो सन्नाटे को चीर के रख दे
इस जहाँ के दरो-दीवार पर तुम्हारी दस्तक .

वीणा  सिंह  

Friday, May 20, 2011

ऐसे ही सारा दिन बीता


रात जो सांकल खुली छोड़ दी 
किसी चोर से , बड़ी भूल से
छूट गई गठरी भारी ।
गठरी मन ऐसा भरमाई
उसको बिन जांचे - परखे
अपने हिस्से की सौगात समझ
जैसे ही हलके से छुआ
निकली दिन की फेहरिस्त बड़ी
सो उगती भोर की प्रथम किरण संग
मन एकदम हो आया तीता
घर की चौखट को लाँघ बढ़े
तपते सूरज के साथ तपे
कुछ धूल -गर्द , आपाधापी
बढ़ते सूरज के साथ बढ़े
सब कामकाज जिम्मेदारी
हारी-बीमारी के थे चर्चे
संदेह-शुबह का था रोना
घटते सूरज के संग -संग
देखा अपना साया बौना
ढलते सूरज के साथ- साथ
घर लौट आए क़दमों भारी
मन एकदम हो आया रीता
ऐसे ही सारा दिन बीता


वीणा सिंह 

परदेस


रोज रात समंदर में जवार जब -जब आइल
फूट गइल छाला मन के ,आँख भर आइल 

पानी में डूब गइल सपना के पिटारी 
ओकरा में रहल हमर घर अउर अटारी   

नदी -तालाब  पाटके ,हम कैसन  सपना लायब
चाँद तलक सीढ़ी मगर चाँद  हाथ   न आयब 

इ कैसन देस ह बाबा ! इ कउन माटी
अंखियन में रेत भरल जियरा  निचाटी

होरी अऊर धनिया के जे रहलन आँख के   जोती 
छूट गैलन गाँव में पीछे हीरा-मोती

अमराई नीलाम भइल,बोझ भइल दूना
सोनचिरैया छोड़ गइल ,महल-गाँव सब सूना

बिन पनहीं रेत पर अब त चलल न जाला
लाख क मनवां खाक भइल, अब कौड़ी में बिकाला

काँकर-पाथर जोड़ के ,काँकर -पाथर भैनी
आवत रस्ता याद रहे ,जावत भूल गइनी

फाग-दिवाली करत-करत दिन बीतल  कई बरसों
अब अपने सूरत गैर भइल ,कल जाईं के परसों .


वीणा सिंह




मन-मृगछौना


तुम सोचोगी मन मृगछौना कहाँ कुलांचें भरता है
पल के किसी आखेटक हाथों वह  मरने से डरता है

रात के एक अकुलाये क्षण सा अंधियारे में जाग रहा 
जाने किन किस्सों -कलियों -बागों -गलियों में भाग रहा 

तुम सोचोगी मन-प्रांतर के सारे तट अब रीते हैं 
इन्द्रधनुष के रंग धुंधले हैं ,चाँद के किस्से बीते हैं 

रूखे लोग ,ढोंग की बातें -सब साया सा लगता है
बीहड़ ,वीराना ,बेगाना नगर पराया लगता है

एक शाम को ऐसे में ,बस द्वार खोल के रखना तुम
बारिश के छीटों से गीले मृगछौने से कहना तुम -

`सोंधी धरती ,झूमती शाखें ,गुलमोहर से लाल गगन
चलो कुलांचें भर लेते हैं ,नदी-पहाड़ी-जंगल-वन


थोड़ी देर को सब भूलोगी ,नगर-परायों की बातें
ऊंच-नीच ,पथरीले रस्ते ,बीहड़-वीरानों की रातें

हल्दी-चावल के वे किस्से ,मैके के जब याद आयें
कुछ लाये ,कुछ गांठ बंधे, कुछ देहरी पर बिखराएँ

ऐसे ही जीवन में तुम कुछ रख लेना,कुछ सह लेना
`सब कुछ किसे कहाँ  मिलता है'-मृगछौने को कह देना. '


वीणा सिंह