तुम सोचोगी मन मृगछौना कहाँ कुलांचें भरता है
पल के किसी आखेटक हाथों वह मरने से डरता है
रात के एक अकुलाये क्षण सा अंधियारे में जाग रहा
जाने किन किस्सों -कलियों -बागों -गलियों में भाग रहा
तुम सोचोगी मन-प्रांतर के सारे तट अब रीते हैं
इन्द्रधनुष के रंग धुंधले हैं ,चाँद के किस्से बीते हैं
रूखे लोग ,ढोंग की बातें -सब साया सा लगता है
बीहड़ ,वीराना ,बेगाना नगर पराया लगता है
एक शाम को ऐसे में ,बस द्वार खोल के रखना तुम
बारिश के छीटों से गीले मृगछौने से कहना तुम -
`सोंधी धरती ,झूमती शाखें ,गुलमोहर से लाल गगन
चलो कुलांचें भर लेते हैं ,नदी-पहाड़ी-जंगल-वन
थोड़ी देर को सब भूलोगी ,नगर-परायों की बातें
ऊंच-नीच ,पथरीले रस्ते ,बीहड़-वीरानों की रातें
हल्दी-चावल के वे किस्से ,मैके के जब याद आयें
कुछ लाये ,कुछ गांठ बंधे, कुछ देहरी पर बिखराएँ
ऐसे ही जीवन में तुम कुछ रख लेना,कुछ सह लेना
`सब कुछ किसे कहाँ मिलता है'-मृगछौने को कह देना. '
वीणा सिंह
The poetess seems to be of a very high calibre. Love returning to this blog again and again
ReplyDeleteThanks maam.
Deleteबहुत सुंदर कविता!बिल्कुल आपकी तरह!हृदयस्पर्शी!मेरी शुभकामनाएँ!
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