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मुफ़स्सिल में रस्साकशी हो
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मुफ़स्सिल में रस्साकशी हो
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Friday, December 10, 2010
मुफस्सिल में रस्साकशी हो
मुफस्सिल में रस्साकशी हो
या दौर हो कत्ले-आम का
इसी बीच छत पर हों नज़ारे
शायद दीदार उस मेहताब का
सर पे बाँध कर रहता हूँ अक्सर
तकल्लुफ का कफ़न और सिलसिले
कि कितने अरसा गुजरा दे न पाया
कोई जवाब उनके जवाब का
वीणा सिंह
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