बहुत अंगार लिये फिरती है अपनी जमीं
आसमाँ को हवा दे दो,थोड़ा पिघल जाए
बेसुरी कैफियत के रात-दिन मजमे लगे रहे
सुर कोई नया छेड़ो,तरन्नुम में ढल जाए
सदियों बुत तराशते रहे,बुत बने रहे
ऐसी चोट दो उनसे कभी खुदा निकल आए
दिन-रात पलटते रहे हम वर्क माजी के
पर्चे बाँट दो पेश्तरकि ये नक्शा बदल जाए
बिलावजह बैठे रहे परशिकस्त रात भर
खिड़कियाँ खोलने की देर है,मंजर बदल जाए.
वीणा सिंह
आसमाँ को हवा दे दो,थोड़ा पिघल जाए
बेसुरी कैफियत के रात-दिन मजमे लगे रहे
सुर कोई नया छेड़ो,तरन्नुम में ढल जाए
सदियों बुत तराशते रहे,बुत बने रहे
ऐसी चोट दो उनसे कभी खुदा निकल आए
दिन-रात पलटते रहे हम वर्क माजी के
पर्चे बाँट दो पेश्तरकि ये नक्शा बदल जाए
बिलावजह बैठे रहे परशिकस्त रात भर
खिड़कियाँ खोलने की देर है,मंजर बदल जाए.
वीणा सिंह
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