मैंने तो इतना सोचा था——
नील चंदोवे नीचे बैठे,
सन्नाटे की तरल लहर में
शब्दों का विस्तृत जाल बिछाये,
भावों का चंचल नर्तन देखूँ।
सन्नाटे को ओक में भरके
देखूँ उसके गंध रूप को,
देखूँ खग-कुल की उड़ती पंक्ति
आसमान में चित्र उकेरे,
खिलती-ढलती धूप को
इधर-उधर बिछते सकुचाते।
इस विराट औदार्य के पीछे
कण-कण के सौन्दर्य के पीछे
एक करुण धुन लेकिन सहसा
छिन्न-भिन्न कर जाती है,
प्रस्तर क़दमों से घूम-घूम
स्तब्ध-क्षुब्ध कर जाती है,
फैलाकर पंजे भीमकाय
झंझावात मचाती है,
ज्यों चंचल-चपल हिरणों का झुंड
सहसा गति में हो अवरुद्ध,
चित्र सरीखा भीत-भाव
रुक जाए होके हतबुद्ध,
फिर मेरे चंचल बाल-भाव
अतल गहराई बैठ विकल,
अंगुली से मेरी छूट निकल
निस्पन्द भाव रह जाते हैं,
गहरी उद्विग्न जल-लहरी में
मृतप्राय बह जाते हैं।
वीणा सिंह
नील चंदोवे नीचे बैठे,
सन्नाटे की तरल लहर में
शब्दों का विस्तृत जाल बिछाये,
भावों का चंचल नर्तन देखूँ।
सन्नाटे को ओक में भरके
देखूँ उसके गंध रूप को,
देखूँ खग-कुल की उड़ती पंक्ति
आसमान में चित्र उकेरे,
खिलती-ढलती धूप को
इधर-उधर बिछते सकुचाते।
इस विराट औदार्य के पीछे
कण-कण के सौन्दर्य के पीछे
एक करुण धुन लेकिन सहसा
छिन्न-भिन्न कर जाती है,
प्रस्तर क़दमों से घूम-घूम
स्तब्ध-क्षुब्ध कर जाती है,
फैलाकर पंजे भीमकाय
झंझावात मचाती है,
ज्यों चंचल-चपल हिरणों का झुंड
सहसा गति में हो अवरुद्ध,
चित्र सरीखा भीत-भाव
रुक जाए होके हतबुद्ध,
फिर मेरे चंचल बाल-भाव
अतल गहराई बैठ विकल,
अंगुली से मेरी छूट निकल
निस्पन्द भाव रह जाते हैं,
गहरी उद्विग्न जल-लहरी में
मृतप्राय बह जाते हैं।
वीणा सिंह