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Tuesday, November 10, 2020

आम आदमी

 मैं आम आदमी हूँ 

मुझे कमज़ोर न जानो-

एक हाथ में छाता लिए,

आँखों पर धूप के चश्मे,

पैंट की मोहरी को ऊपर चढ़ाए, 

टेढ़े मेढ़े रास्तों की उलझनों को 

मैं नट की कुशलता से धता बताकर 

पार कर लेता हूँ कीचड़ से भरा रास्ता।

मैं अपने शब्दों को बचाकर रखता हूँ 

सही जगह पर ही इस्तेमाल करने को,

मार्क्स और डार्विन की थ्योरी,

अस्तित्ववाद का बुखार—-

सब अब भी घुलता है नसों में।

मैं जैसों-तैसों को वोट नहीं देता, 

कोई छीन नहीं सकता है उसे।

मैं भीड़ भी नहीं हूँ,

क्योंकि जल की धारा की तरह

वह कुपात्र को भी अपना अस्तित्व सौंप देगी,

मैं वट वृक्ष की बाहों से झूलती जटाओं की तरह हूँ,

जिसे आसानी से काटा नहीं जा सकता।

 

वीणा सिंह