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Saturday, December 15, 2018

पापा कहते हैं

चौपाल वालो आओ, शाम ढल जाये,
बहुत दिन हो गये तुमसे बतियाये

वैसे तो मुझको भी फ़ुरसत कहाँ थी?
करने को सब कुछ, पर ताक़त कहाँ थी?

यह छत ये आंगन ये वृक्ष यह डाली
सबका अकेला मैं ही हूँ माली।

देहरी के भीतर की दुनिया सजाये
बैठा हर आहट पर तन-मन लगाये

कभी रंग-रोगन कभी कोई उलझन
ऐसी ही दुविधा में बँधा हुआ यह मन।

मेरे आकाश करें धरती के फेरे
देहरी पर दीप धर हाथ थकें मेरे

बहुतेरी उलझन है, उनकी भी जानूँ
दुनिया अब वक़्त की चेरी है मानूँ।

वैसे तो दोनों ने सोचा है फिर भी
अकेले इन्सान को ज़रूरी है टी.वी.।

उनमें से एक भी मुझको न भाया,
मोबाइल, टी.वी. की समझूँ न माया।

चश्मे के पैकेट को ढूँढूँ मैं जब तक,
शब्दों के तार जुड़, कट जायें तब तक।

सालों से देता हूँ देहरी पर पहरा
फूलों और पत्तों में खोजूँ कोई चेहरा।

बाग़ों में डोल-डोल करता हूँ बातें
अपने से बोल-बोल कटती हैं रातें।

ऋतुओं बयार और अंधड़ के साये,
सालों के क़िस्से दिल पर छा जाए।

हर कोई उलझा है अपने ही रंग,
मैं उलझा बैठा ख़ालीपन के संग।


वीणा सिंह