अभी इबादत में देरी है
बड़ी मसरूफियत है
हर सिरा उलझा हुआ है
यही बस कैफियत है
जमीं मयस्सर हुई है
तन्हाई अभी बाकी है
चाँद निकला है मगर
जुन्हाई आनी बाकी है
चराग रोशन तो हुए
रुसवाइयों का साया है
दरो दीवार पे जैसे
जिन का पाँव आया है
अल्फाज होंठो पर गुमसुम
मुस्कुराना बाकी है
साज़ की तैयारियां हैं
नगमे सुनाना बाकी है
बुत तराश डाले हैं
जान आनी बाकी है
अजान हो भला कैसे
फरमान आना बाकी है
सबब सवाब के किस्से
सजाये बैठे हैं
अपने खुदा को कब से
बुत बनाए बैठे हैं
दहलीज मुक़द्दस तो हुई
इंसान आने बाकी हैं
शेख-बरहमन सब हैं
मुसलमान आने बाकी हैं .
वीणा सिंह