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Saturday, December 11, 2010

अयोध्या



अभी इबादत में देरी है
बड़ी मसरूफियत है
हर सिरा उलझा हुआ है
यही बस कैफियत है

जमीं मयस्सर हुई है
तन्हाई अभी बाकी है
चाँद निकला है मगर
जुन्हाई आनी  बाकी है

चराग रोशन तो हुए
रुसवाइयों का साया है
दरो दीवार पे जैसे
जिन का पाँव आया है

अल्फाज होंठो पर गुमसुम
मुस्कुराना बाकी है
साज़ की तैयारियां हैं
नगमे सुनाना बाकी है

बुत तराश डाले हैं
जान आनी बाकी है
अजान हो भला कैसे 
फरमान आना  बाकी है 

सबब सवाब के किस्से 
सजाये बैठे हैं 
अपने खुदा को कब से 
बुत बनाए बैठे हैं 

दहलीज मुक़द्दस तो हुई 
इंसान आने बाकी हैं 
शेख-बरहमन सब हैं 
मुसलमान आने बाकी हैं . 


वीणा सिंह