राहिल को जब चढ़ा बुख़ार
एंटिबायटिक्स दिये हज़ार
घर में रहकर वह चकराया
इधर-उधर बस बौराया
दिन भर विस्तार पर पड़ा रहा
ज़िद्दी घोड़े सा अड़ा रहा।
करना है समथिंग समथिंग
लाइफ़ हुई बोरिंग-शोरिंग
लेकिन वह समथिंग क्या हो?
आइडिया टिंग टिंग क्या हो?
एक विचार मन में आया
बाहर दरवाज़े पर आया
हरी घास की चादर पर
फूल-फूल पर क्यारी पर
एक तितलिया उड़ती थी
हर क्यारी में मुड़ती थी।
सोने का टुकड़ा चमक रहा
रूप धूप में दमक रहा।
क्यों न रहे वह मेरे संग!
मैं रंग जाऊँ उसके रंग!
यही विचार मन में जागा
राहिल तुरंत घर में भागा।
लकड़ी का बक्सा बनवाया
फूलों पत्ती से सजवाया ।
घास का विस्तर लगवाया
सिरहाने पानी रखवाया।
मुट्ठी में बन्द किया तितली को।
बक्से में बन्द किया तितली को।
सुबह बक्स को खोला जब
तितली नज़र न आयी तब
राहिल बड़ा हैरान हुआ
मन ही मन परेशान हुआ
धीरे से बक्सा उठवाया
हरी घास पर रखवाया
कोने में बिल्कुल मुरझाई
तितली तभी नज़र आयी।
सूरज भी था आँखें मींचे
ऊपर से देख रहा नीचे
फिर धीरे से आँखें खोलीं
फूलों ने भी पाँखें खोलीं
अपनी किरणों से नहलाया
तितली के पंख को सहलाया
तितली उड़ कर आज़ाद हुई
रपुनजल की कहानी याद हुई।
वीणा सिंह
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