मेरे घर में सिक्के कहीं भी फैले रहते-कहीं भी माने कहीं भी-तकिए के नीचे, पलंग के नीचे,टेबल के ऊपर, टी.वी.के पास, गंदे कपड़ों के ढेर में, पैंट की जेब में, और तो और कभी -कभी वाशिंग मशीन से धुल कर नए-नए चमचमाते निकल आते। सिक्के घर से बाहर जाते नहीं थे, बाहर से घर में आने की प्रकिया जरूर जारी रहती। कंजूस के धन की तरह लोग उन्हें समेटने में लगे रहते, हालाँकि इसमें वणिकों की साधना कम, आलस्य की भावना अधिक होती। जहाँ जीवन में मनुष्य की पीठ पर निरंतर दैनिक जीवन का बोझ बढ़ता चला जाता है, वहाँ मनुष्य भी गर्दभ की तरह कंधे उचकाकर, दुलत्ती मारकर अपने बोझ की थोड़ी-बहुत मिट्टी झाड़ने से बाज नहीं आता।
इसके अलावा बाजार के छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे तत्वों से मन ही मन प्रतियोगिता भी चलती रहती है - भई! देना है तो तुम दो, मैं क्यों दूँ? - इस तरह न कहकर, मन ही मन इस भाव को दबाकर, हर दुकानदार को थोड़ी देर चेंज के लिये परेशान देख खुद खुश होने की चालाकी उसे थोड़ी देर के लिये ही सही जीत की खुशी तो दिला ही देती है। वह एक मिनट उस आदमी का होता है, जो सिक्का मुट्ठी में दबाये तो हुए है, पर उस हैरान-परेशान दूसरे आदमी को देना नहीं चाहता। जाने कब की, इस जनम की या पिछले जनम की दुश्मनी यहाँ कारगर हो जाती है। इस नाटकीय परिस्थिति में मजबूत पार्टी के मन में अनेक रचनात्मक संवाद जन्म ही नहीं लेते, अस्त्र-शस्त्र बनके हवा में लहराने लगते हैं, जैसे-"अब घूमो बच्चू, दो रुपये के चेंज के लिये गली-गली!" अथवा "खबरदार, जो दो रुपये के बदले मुझे टॉफी पकड़ाई!'अथवा " अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे...." जाहिराना तौर पर प्रतिक्रिया कुछ भी हो सकती है जैसे - सिक्के का चोर सामान काऊँटर पर पटककर उसे वापस कर देने का नाटक करे या सामने वाले के चेहरे की बेचारगी का मन ही मन आनंद ले या इस रस्साकशी में कुछ रुपयों की रियायत पा जाये या अगर दूसरा पक्ष कोई टैक्सी या रिक्शा वाला हो तो
उससे हाथापाई होने की संभावना के बावजूद अपनी जगह पर अड़ा रहे कि उसके पास एक नया पैसा भी चेंज नहीं।
इस तरह की परिस्थितियों की द्वंद्व प्रतियोगिता में जीतते चले जाने की प्रक्रिया के फलस्वरूप ही हमारे घर में सिक्कों का पहाड़ जमा होता चला गया और सही जगह पर ठौर न मिलने के कारण सरदर्द बनता गया। अवाँछित अतिथि की तरह न सिर्फ उसे पनाह मिली, बल्कि नए- नए शहरों में घुमाने के बाद अंत में उसे एक कोने में पटक दिया गया। कहना न होगा कि उसकी यह अंतिम स्थिति किसी नई बहुरिया के विवाह की उत्तरार्ध-कथा है। एक दिन दूकान से सामान मँगवाकर दाम चुका देने के बाद मेरे मुँह से निकला कि रुपयों के बदले चेंज ही दे देती। यह बात मुँह से निकलने की देरी थी कि सामान लाने वाला लड़का इस तरह मुस्काया जैसे बारिश की पहली बौछार के छँटते ही धूप निकल आई हो। छूटते ही बोला-
""कभी भी, कितना भी ।चिल्लर के लिये कभी भी। जब बुलाओ,हाजिर हो जाऊँगा।"
उस समय तक मुझे मुम्बई में बहुप्रचलित इस शब्द का अर्थ नहीं मालूम था। ''चिल्लर'' शब्दमुझे बड़ा ही गँवई महसूस होता था जैसे बहुत दिनों के गँधाते कपड़े पहने कोई आस- पास घूम रहा हो । इसी तरह dollar शब्द से भी मैं अपरिचित थी जो अधिकतर पाँच रुपयों के सिक्के के लिये इस्तमाल होता है। इन दोनों का सिक्कों से क्या सम्बंध है, मुझे मालूम न था।
जैसे बच्चे को मिठाई मिलने की संभावना पर खुशी हो और वह वक्त-बेवक्त हँसता-मुस्कराता दरवाजे से झाँकता रहे, लड़का भी कई चक्कर लगा गया।
इस बीच प्लास्टिक की थैली में रखा सिक्कों का पहाड़ निकाल कर मैं उसे गिनने बैठी। पेन-कागज लेकर हिसाब लिखते समय पाँच के अलग, दो के अलग एक के अलग छोटे-छोटे ढेर बनने लगे। गिनती जाती और रुपयों में तब्दील करती जाती।
काफी देर के बाद मैंने घड़ी की ओर देखा -इस पहाड़ को निपटाने में मुझे डेढ़ घंटे लग चुके थे। शायद इसी को कमरतोड़ परिश्रम कहा गया है। मेरा सिर भन्ना रहा था, रीढ़ की हड्डी और कमर का दर्द बढ़ चुका था और गर्दन अकड़ चुकी थी। इस पार्थिव जगत के साथ अपने संवेदनशील मन को लेकर अंत में जिस प्रकार निरंतर असफलता का सामना होता रहता है, उसी प्रकार अपने इस हिसाब की माथापच्ची में भी समय गुजरता गया।
महानगर की नन्हीं सी बाल्कनी में आने वाली धूप आई भी और चली भी गई - पता ही नहीं चला। मेरे अथक प्रयास और परिवार के अन्य सदस्यों की नुक्ताचीनी के बावजूद वहाँ गमलों में बड़ी शान से अपने अस्तित्व का हर्षपूर्वक प्रदर्शन करते - मेरे सुख-दुख के साथी कुछ गिने- चुने फूलों पर रंग-बिरंगी तितली आई भी और चली भी गई। मेरी पसंदीदा-हल्दी के रंगों वाली चिड़िया-जिसे बंगाल में उसके रंग के कारण'"बोनिकेर बोऊ"-अर्थात-बनिए की बहू-कहकर पुकारा जाता है, नाराज होकर बिना दर्शन दिए चली गई।धूप में मरकत-मणि की तरह झिलमिलाती इस चित्र-विचित्र दुनिया की पुस्तक का एक भी पन्ना न मैं ने उलटा, न पढ़ा - मेरा वह दिन अकारथ ही रहा।
लड़के के चले जाने के बाद मैंने इस चिल्लर-प्रसंग पर मनन किया। अचानक अंधेरे में जैसे बिजली चमक जाए, लगा कि चिल्लर और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
इस आप्त ज्ञान के बाद जो कुछ समझ में आया, वह यह था-जिस तरह चिल्लर धीरे-धीरे जमा होकर पहाड़ बन जाता है,दुखों की तहें भी छाती में बैठ जाती हैं। तब मनुष्य को रोज- रोज उन्हें गिनते रहने की आदत सी हो जाती है। इस ढेर के सामने आदमी का वजूद छोटा पड़ जाता है। उचित-अनुचित सभी जगहों पर उनका वर्चस्व हो जाता है।
इन सलवटों को उलटना-पुलटना ही एकमात्र काम हो जाता है।यह एक नशे की तरह है, जिसमें इंसान की कमर भले ही दुख जाये, आँखें थक जायें, पीठ अकड़ जाये, वह ऐसा करने से बाज नहीं आ सकता। इन चिल्लरों को गिने बिना उसे संतोष-धन प्राप्त नहीं होता।
और अंत में दुखों के सिक्के गिनने हों तो जीवन के सौंदर्य-पक्ष की ओर ध्यान कहाँ जाता है? कोयल कूकती रहे, धूप सोना बिखेरती रहे, मौसम गुनगुनाता रहे - सुखों के फूलों को चुनने की किसे फुरसत है! इसलिए अच्छा है कि समय-समय पर इन चिल्लरों को खर्च कर डालें।
वीणा सिंह