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Wednesday, November 11, 2020

साँझ

 

आँखों की कोरों में धुंध उतर आई

किसने ये गीली लकड़ियाँ सुलगायी।

 

देहरी पर थकी थकी बैठी है साँझ,

सुधियों के आँचल को फैलाए,

हीरे माणिक मोती बिखराए,

रत्नों के द्वीप में फिरती है साँझ ।

 

ऊँगली की छाँहों से छूटकर 

गलबहियाँ डाले दो बौने साये

अनजानी पगडण्डी दौड़ चले

हँसते बतियाते उमगती है साँझ ।

 

सपनों के देश को छू आए साये

आदमक़द  आहट से घर वापस आए

चौखट और देहरी के बीच में जड़ी हुई

लम्बी परछाई टटोलती है साँझ।

 

आँखों की कोरों में धुंध उतर आई

किसने ये गीली लकड़ियाँ सुलगायी।

 

 

वीणा सिंह