हँसी की पिटारी में
ताले जड़े हैं,
बादलों के पंख
ख़ुद से उलझे पड़े हैं ।
मन की दीवारों पर
स्कूली क़वायदें
दौड़ रहे सपने
धूल फाँकते खड़े हैं।
आँखों को इजाज़त है,
बस ज़रा सा बोल लें
मुखौटे पहन ज़ुबान
बेज़ुबाँ पड़े हैं।
नई लिखी जा रही हैं
कलजुगी इबारतें,
धुले-पुँछे बोर्ड सब
कोने में खड़े हैं।
दुनिया फ़िक्रमंद है,
अब हश्र भला होगा क्या
सब्र की रस्सी बँधे
सारे नट चल पड़े हैं।
खामोशियाँ बोलती हैं,
सुना था किसी दौर में,
इन्सान तो ख़ामोश है,
मुर्दे बोल पड़े हैं।
वीणा सिंह
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