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Saturday, June 16, 2012

जमीन

बहुत अंगार लिये फिरती है अपनी जमीं
आसमाँ को हवा दे दो,थोड़ा  पिघल जाए


बेसुरी कैफियत के रात-दिन मजमे लगे रहे
सुर कोई नया छेड़ो,तरन्नुम में ढल जाए

सदियों बुत तराशते रहे,बुत बने रहे
ऐसी चोट दो उनसे कभी खुदा निकल आए

दिन-रात पलटते रहे हम वर्क माजी के
पर्चे बाँट दो पेश्तरकि ये नक्शा बदल जाए

बिलावजह बैठे रहे परशिकस्त रात भर
खिड़कियाँ खोलने की देर है,मंजर बदल जाए.


वीणा सिंह