Monday, January 19, 2026

चिट्ठी

 बड़ी क़ीमती होती है—

दराज़ों के कोनों में,

अलमारियों के तहख़ानों में 

कई वर्षों से 

व्यर्थ करार दी गई 

ऊल-जलूल

काग़ज़ात के पन्नों से 

झांकती, सर उठाती—

एक मासूम चिट्ठी ।

विगत की दरारों से झाँकती 

साथ लिए आती है

अनगिनत लम्हों की थाती 

अपने नामालूम अस्तित्व का

एहसास दिलाती।

अनगिनत वर्षों से

किसी रोशन वातायन को तरसती

पीले, दाग़दार,

कुतरे पन्नों में तब्दील 

अचानक एक अंकुर सा

पनप आती है—

अब भी आश्वासन देती है

कोमल एहसासों का, 

सुदीर्घ सहअस्तित्व का।

अपरिचय की सीमा से परे,

सहजता की पगडंडी पकड़े 

यही विश्वास 

मन के एकांत 

अछूते कोनों को करता है

निर्भीक रूप से अनावृत ।


वीणा सिंह 

Sunday, January 18, 2026

चाभी के गुच्छे

 आज सोचा है—

चाँदी के गुच्छे में

बँधी हुई चाभियों से

तालों को खोलूँगी 

स्मृतियों में बन्द पड़े ,

साँकलों में क़ैद जड़े—-

हथेली में भर कर

मोल मैं आँकूँगी ।

देखा—कमरों के कोनों में

बेपरवाह फेंके गये 

लिफ़ाफ़ों और दोनों को

धूल धूसरित तहख़ानों,

सपनों से भरी हुई 

अलमारी के खानों को।

किताबों के पन्नों में 

दबे,बदरंग फूलों को,

 साँकल से टूटे

सपनों के झूलों को।

भीड़ है —प्रश्नों की ,

अनजानी पहेलियों की

जानी-पहचानी, कब से—

छूटी सहेलियों की !

सालों पहले सँवरे

अन्तहीन थे कमरे।

बस……*बन्द कर ली आँखें—

जैसे तितली की झर गयी हो पाँखें—

लौट आयी फिर वहीं ,

अपने उन अपनों में 

बंद आँखों के पीछे 

झूलते सपनों में—

चाँद-सूरज की दुनिया

छत पर चुपचाप सी

डरी हुई वह मुनिया!

उत्तान सागर की 

उठती-गिरती लहरें।

नीम की शाख़ों के

लहराते ये पहरे,

तारों से जड़ी हुई,

आसमानी ये रातें,

हवा के झोंके पर

तिर के आईं बातें ।

तितली के पंखों के

सात रंगों की धूलि—

आसमाँ में बादल ने

जाने कब की छू ली!

अभी पहले बन्द कर दूँ 

बेतरतीब ये कमरे—

यहाँ-वहाँ छितराये, 

अतीत के पल मेरे!

खुले आसमानों में,

लाल-पीली-नीली

पतंगों को उड़ने दूँ,

उलझनों की भीड़ को

कहीं और मुड़ने दूँ!


वीणा सिंह 

Saturday, January 17, 2026

स्वप्न राग

 


स्निग्धता का मलय वात है,

पिघले कुंकुम में रंगा प्रात है,

हरित राशि ऋतु साथ-साथ है,

नव उन्मीलित जलजात है।


शाख पर खिल रहे मंजर हैं,

इन सपनों के नूतन स्वर हैं।


अनन्त में कोई अग्निकण हो

पराग का पीताभ वन हो,

इन्द्रधनु में स्नात वन हो

लाल युवा ऊर्जस्वित तन हो।


दिग-दिगन्त पर अग्नि लेख

चित्रित करते इनके कर हैं।


तरल अगन सा मध्याह्न में

पट परिवर्तन हो आंगन में

जाल बिछा अहेरी क्षण में

शर-संधान करे निर्जन में।


निशि-याम क्रन्दन रोदन है

भयभीत वाण हत जर्जर हैं।


निमिष मात्र मन के प्रांगण में

रक्त स्नात टूटे दर्पण में,

सहस्र बिम्बों के कम्पन में 

शेष कथा बाँचे जीवन में ।


हों धराशेष हों मुक्तप्राण

फिर भी चंचल उनके पर हैं


हुलसित प्राची का स्वर किंकण 

दुर्द्धर्ष वात चंडी नर्तन 

क्लान्त दिवस प्रत्यावर्तन 

राग राग का अनुरणन ।


शाख पर खिल रहे मंजर हैं,

इन सपनों के नूतन स्वर हैं ।


वीणा सिंह