आज सोचा है—
चाँदी के गुच्छे में
बँधी हुई चाभियों से
तालों को खोलूँगी
स्मृतियों में बन्द पड़े ,
साँकलों में क़ैद जड़े—-
हथेली में भर कर
मोल मैं आँकूँगी ।
देखा—कमरों के कोनों में
बेपरवाह फेंके गये
लिफ़ाफ़ों और दोनों को
धूल धूसरित तहख़ानों,
सपनों से भरी हुई
अलमारी के खानों को।
किताबों के पन्नों में
दबे,बदरंग फूलों को,
साँकल से टूटे
सपनों के झूलों को।
भीड़ है —प्रश्नों की ,
अनजानी पहेलियों की
जानी-पहचानी, कब से—
छूटी सहेलियों की !
सालों पहले सँवरे
अन्तहीन थे कमरे।
बस……*बन्द कर ली आँखें—
जैसे तितली की झर गयी हो पाँखें—
लौट आयी फिर वहीं ,
अपने उन अपनों में
बंद आँखों के पीछे
झूलते सपनों में—
चाँद-सूरज की दुनिया
छत पर चुपचाप सी
डरी हुई वह मुनिया!
उत्तान सागर की
उठती-गिरती लहरें।
नीम की शाख़ों के
लहराते ये पहरे,
तारों से जड़ी हुई,
आसमानी ये रातें,
हवा के झोंके पर
तिर के आईं बातें ।
तितली के पंखों के
सात रंगों की धूलि—
आसमाँ में बादल ने
जाने कब की छू ली!
अभी पहले बन्द कर दूँ
बेतरतीब ये कमरे—
यहाँ-वहाँ छितराये,
अतीत के पल मेरे!
खुले आसमानों में,
लाल-पीली-नीली
पतंगों को उड़ने दूँ,
उलझनों की भीड़ को
कहीं और मुड़ने दूँ!
वीणा सिंह
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