Thursday, June 27, 2019

प्रेमा के जन्मदिन पर


सालों से देखा है तुमको
अब जाकर पहचाना है
अन्तर में कितने रंग लिये हो
उन सबको हमने जाना है।

मंथर गति से चलती-फिरती
सरिता सी तुम लहराती हो
बगिया के फूलों के संग-संग
तुलसी दीप बन जाती हो।

चंचल किरणों की कौंध समेटे
बचपन क्रीड़ा कर जाता है
यौवन का कोई मीठा क़िस्सा
मुख पर व्रीड़ा मल जाता है।

राग-विराग को शासित करती
बाँध रखा है अपने मन को
आस्था के दीपक सी जलती
ज्वलन्त छवि मन-दर्पण को।

आज तुम्हारे जन्म-दिवस पर
तुमसे यह कहने आए हैं
कुछ पल बीते संग-संग में 
हँसते रोते हम आए हैं।

जिस मुख पर पूरब की लाली
अरुणिमा रंगती आई है
मन को इन्द्रधनुष के रंग से
उद्भासित करती आई है।

ऐसे ही मन के आँगन  में
काले बादल छा जाएँ तो
उमड़-घुमड़ कर हृदय में रुदन
आँखों में आँसू लायें तो।

नाम पुकारो उस दिन तब तुम
सुमति, वीणा, सुप्रिया, ललिता
दौड़ी-भागी आ जाएँगी
आशा, सुचेता, सुकन्या, सरिता।

हाथ पकड़ कर गले लगाकर
कुछ हँस लेंगी, कुछ रो लेंगी
बस फिर क्या, उन कठिन दिनों की 
व्यथा-कथा कुछ तो कम होगी।

वीणा सिंह

Sunday, June 23, 2019

मैंने तो इतना सोचा था

मैंने तो इतना सोचा था——
नील चंदोवे नीचे बैठे,
सन्नाटे की तरल लहर में
शब्दों का विस्तृत जाल बिछाये,
भावों का चंचल नर्तन देखूँ।
सन्नाटे को ओक में भरके
देखूँ उसके गंध रूप को,
देखूँ खग-कुल की उड़ती पंक्ति
आसमान में चित्र उकेरे,
खिलती-ढलती धूप को
इधर-उधर बिछते सकुचाते।
इस विराट औदार्य के पीछे
कण-कण के सौन्दर्य के पीछे
एक करुण धुन लेकिन सहसा
छिन्न-भिन्न कर जाती है,
प्रस्तर क़दमों से घूम-घूम
स्तब्ध-क्षुब्ध कर जाती है,
फैलाकर पंजे भीमकाय
झंझावात मचाती है,
ज्यों चंचल-चपल हिरणों का झुंड
सहसा गति में हो अवरुद्ध,
चित्र सरीखा भीत-भाव
रुक जाए होके हतबुद्ध,
फिर मेरे चंचल बाल-भाव
अतल गहराई बैठ विकल,
अंगुली से मेरी छूट निकल
निस्पन्द भाव रह जाते हैं,
गहरी उद्विग्न जल-लहरी में
मृतप्राय बह जाते हैं।


वीणा सिंह