Saturday, December 11, 2010

कश्मीर



मेरी हिमाकत मेरे गुरूर को मुआफ कर
गर ऊंची शाख पर गुमसुम से उस परिंदे को
उसकी तन्हाई के आलम से जगाया मैंने--
गुनगुनाये , मेरे हुक्म की तामील  करे !
सर्द मौसम में बरबादियों के किस्से को
लरजते होंठों से नगमों में पिघल जाने दे .
जैसे ख़्वाबों में कोई लरजिश हो
या हकीक़त में कोई साज़िश हो 
अपने होंठों पर शिकायत लाके
उसके नगमे नाकाम कहते हैं ----
जैसे चौराहे पर नुमाइश हो
तमाशबीन आके निकल जाते हैं 
हवस का मारा कोई बेजुबान किस्सा हो
तलाश ख्वाब की , हकीक़त की नहीं
आते हैं रंगो-बू तलाश करने को
शिरकत में किसी मय्यत की नहीं.

और किस्से थे पहले बयाँ इस जन्नत में 
अब दोजख की हवा छू के निकल जाती है 
कुछ और भी रंग होते थे इस वादी में 
अब हर साँस पर लहू का रंग तारी है .

सर्द रातों में मेरा नगमा 
एक साए सा फिरा करता है 
सीने पर दर्द का असबाब लिए 
कश्मीर शिकारे में रोज फिरता है.

वीणा सिंह

अयोध्या



अभी इबादत में देरी है
बड़ी मसरूफियत है
हर सिरा उलझा हुआ है
यही बस कैफियत है

जमीं मयस्सर हुई है
तन्हाई अभी बाकी है
चाँद निकला है मगर
जुन्हाई आनी  बाकी है

चराग रोशन तो हुए
रुसवाइयों का साया है
दरो दीवार पे जैसे
जिन का पाँव आया है

अल्फाज होंठो पर गुमसुम
मुस्कुराना बाकी है
साज़ की तैयारियां हैं
नगमे सुनाना बाकी है

बुत तराश डाले हैं
जान आनी बाकी है
अजान हो भला कैसे 
फरमान आना  बाकी है 

सबब सवाब के किस्से 
सजाये बैठे हैं 
अपने खुदा को कब से 
बुत बनाए बैठे हैं 

दहलीज मुक़द्दस तो हुई 
इंसान आने बाकी हैं 
शेख-बरहमन सब हैं 
मुसलमान आने बाकी हैं . 


वीणा सिंह

कथावाचक



कथावाचक ने कही एक उलटी कथा
नायिका न रम्भा न उर्वशी थी
नायक की जान भी सांसत में फँसी थी 
विदूषक के चेहरे पर खलनायकी हँसी थी
अजीब घालमेल था
श्रृंगार के साथ रौद्र
हास्य और वीभत्स का मेल था

लोगों ने रोका
चिल्लाकर टोका - `निरा बकवास है!
किसी आर्ट फिल्म-सा उबाऊ उचाट है'

कथा, पर, बढ़ी
रंगहीन भावों पर उतरी चढ़ी
पथरीले रास्तों के कई मोड़ मुड़ी
हँसने पर रोई, रोने पर हँसी

क्या ही अजब था
पिटारा गजब था
लोगों ने धिक्कारा-
कथा नहीं व्यथा है
सख्त सिरदर्द है -लाइलाज मर्ज है
पिछले जन्म का अनचुका कर्ज है

शाम तक ऐसे ही चलती रही कथा
कष्ट से पीड़ा से लोगों ने आह भरी
वाचक ने ममता से कहा - `अब इति'

शंखध्वनि हुई
लोगों ने हर्ष से शीश नवाए
किसी ने कहा कथा प्रभु की थी
किसी ने कहा - हम सबकी .


राजीव

Friday, December 10, 2010

मुफस्सिल में रस्साकशी हो



मुफस्सिल में रस्साकशी हो
या दौर हो कत्ले-आम का
इसी बीच छत पर हों नज़ारे
शायद दीदार उस मेहताब का


सर पे बाँध कर रहता हूँ अक्सर
तकल्लुफ का कफ़न और सिलसिले
कि कितने अरसा गुजरा दे न पाया
कोई जवाब उनके जवाब का

वीणा सिंह