एक बोर था।बोर के मन मेँ बड़ा शोर था। करवट बदलता,टाँगेँ उछालता,आइने मेँ अलग-अलग तरह के चेहरे बनाता, कभी सिर के बल खड़ा हो जाता,कभी हवा मेँ तलवार भाँजता। उसे सारी आवाजेँ कुछ ज्यादा ही जोर से सुनाई देतीं- हवा बहती तो लगता,नदी गरज रही है। जब लोग बातें करते,वह समझता कि कोई उसे डाँट रहा है।आसमान मेँ एक टुकड़ा बादल दिखते ही वह भाग कर कमरा बंद कर लेता। कभी- कभी तो उसे एहसास होता कि बारिश ने उसे पूरा भिगो दिया है । पेड़ के पत्तोँ मेँ हलचल होते ही उसका दिल धड़क जाता। कभी-कभी वह बहुत दुखी हो जाता- यह कौन सा डर है, जो उसे परेशान करता है! आखिर और भी तो लोग हैं, उसके आस-पास जो हँसते-खेलते,मुस्कराते-चहचहाते हैं! धीरे-धीरे वह उदास रहने लगा।वह फूलों की ओर देखता,पर वे बेजान दिखते- रंग ,न रूप ।उसका कोई साथी न था।उसके मुँह बनाकर घूमने की आदत के कारण सब उससे चिढ़े रहते।वह खुद भी अपने-आप से परेशान हो जाता,सोचता-पता नहीं क्या बात है,सब मुझसे नाराज रहते हैं!
उसकी हालत दिन पर दिन बिगड़ने लगी,चेहरा पीला पड़ने लगा,उसके स्वास्थ्य पर असर दिखाई देने लगा।
एक दिन उसने सोचा-मैं अपने-आप से खुश नहीं और लोग भी मेरे करीब नहीं आते।मुझे इसका कोई हल ढूँढना होगा।वह घर के बाहर के बगीचे में नरम घास पर बैठ गया ।अचानक उसकी निगाह अपने चारों ओर पड़ी-थोड़ी देर को उसे लगा कि वह कोई सपना देख रहा है।
चारों ओर चम-चम करती धूप खिली थी,गुलाब के फूलों पर उसकी चमक उसे और कोमल बना रही थी। अनार के पेड़ लाल फलों से लदे हुए थे,भँवरे गुन-गुन करते उड़ रहे थे,बिजली के तारों से होकर गुजरती हवा उसमें धीमे स्वर में रागिनी उत्पन्न कर रही थी,मैना पुकार रही थी और हरे-नीले पहाड़ी तोते उड़ते हुए आसमान में रंगों की लकीरें खींच रहे थे। बोर ने आँखें मूँद लीं,उसे नशा छा गया-आह! दुनिया कितनी सुन्दर है! ने इसे देखा ही नहीं।
वह मुस्कराया।वह उठा,उसका मन नाच उठा।घर में आकर आइने के सामने अपना चेहरा देखा-वह हँसा,उसका चेहरा चमकने लगा।उसने समझ लिया अब उसे किसी बात का डर नहीं।तभी किसी ने उसका नाम लेकर पुकारा-उसके दोस्त-चुन्नु,मुन्नु उसे खोजते उसके घर आ पहुँचे थे।उसका चेहरा खिल उठा। वह दोस्तों के साथ अपनी दुनिया में खो गया।
वीणा सिंह
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