Saturday, December 10, 2011

मास्टर स्ट्रोक

शून्य की चारपाई पर
थोड़ा अधलेटे, कुछ बैठे
कुछ अपने आप से रूठे
अपनी सफेद दाढ़ी पर
उंगलियाँ फिराते
ऊब उठे अचानक!
मन की तरंग मचली,
तूलिका में बदली,
कई रंगों में ढली,
कैनवस पर छिटकी,
सागर की नन्हीं बूंदें,
सपने भर आँखें मूंदे
रस इधर-उधर छलका
स्निग्ध भाव सोए
झरनों से फूटे
कहीं तरल नदियाँ
कहीं बेल-बूटे!
हो उठा साकार
क्षितिज का विस्तार-
बना एक कोलाज!!

वीणा सिंह 

रेशम के गुच्छे

सब देखा - गुम्बद, मेहराब, परकोटे
धूप आकृतियाँ बुनती
छत पर आलसी बिल्ली सी
पंजों के जोर उचकती
यहाँ-वहाँ पर बिखरे बेबाक कहकहे चुनती

सब देखा- सूने गह्वर-विवर
रहस्यमय संकेतों में घिर
कपोतों के संग युगल
युगलों की शाश्वत भाषा
मन की ऊँची प्राचीरें
अगम्य-बोध नदी तीरे
गढ़ती नई परिभाषा!

देखा अंधेरे का चुपके
प्रकाश द्वार पर विलयन
तारों से जड़े चंदोवे में
नयनों का उन्मीलन
देखा कोहनी पर झुका चाँद
प्रांगण में झरती चाँदनी
मौसम के संग हो एकतान
गुनगुन करती रागिनी
रागों में घुलती यामिनी

देखा भित्तियों दीर्घाओं में
कलाकृतियों का इतिहास अमर
अनवरत कोलाहल के बीच
अगरु-धूम सा मंत्र मुखर
अन्त:सलिला सी पाटों में
कितनी बातें मौन रहीं
कितनी सदियाँ चुपचाप बहीं।

सब देखा
दिन-रात की बुनी चटाई पर
मौसम को बैठे-बैठे
गिनते रहना पहरों को
रेशम के गुच्छों में बंधकर
आती जाती लहरों को

सीमाबंदी के पार खड़ी
जब कभी अकेली हो जाऊँ
विह्वल उदास हो रात बड़ी
तब चुपके से एकांत में
रेशम के गुच्छे खोल-खोल
मैं अपना दिल कुछ बहलाऊँ
मैं अपना दिल कुछ बहलाऊँ

वीणा सिंह 

Thursday, December 8, 2011

Silken Tassel

The sight of all that I had seen-
Of domes and arches and walls raised tall,
Of sunlight upraised,
 Like a cat rearing on her paws,
From the terrace,
To seize wherever she chose,
Laughter and merriment floating free…

All the sights I once had known,
Spaces and niches, corners, shades and grots,
Where none have ingress
But whose arms,
As minds and words
Are intertwined,
As in a air above them
Pigeons bill in pairs.
A soft alphabet-
Spilling out meanings-
Impregnable as high castle walls,
Steep as turrets none may scale-
Senses set afloat on
Rivers of the mind,
Fathomless to the world beyond them
Leaving understanding far behind…

I have observed how
At the threshold of light,
The darkness of night
Stealthily wrapped itself
In the colors of
The milky dawn.
And as the star-studded sky
Blinked with a myriad eyes,
The moon pored
Over the courtyard beneath,
Resting with her elbows
On the tent of sky,
Looking down in the pale shine of her beams
At the melodies playing
In the season’s pageant,
One with the time of year,
As night lay dwindling, melting,
Dissolved in a soft web of musical tones…

And I have read
History endlessly carved
Atop the balconies and fluted walls,
Immortal, its whispers rising,
Above the ceaseless tumult
Filling up space
Like the smoke of incense,
Wafting,
Head up-borne, to the tunes
Of  swirling, sonorous chants-
Stone speaks after centuries
Flowed, soundless, down
The rivers between
The shores of secret banks…

I have known it all,
Seeing the Seasons
Counting the hours,
As they rose and fell,
Seated on a carpet
Of day interlaced
With strands of night,
Time I have caught
In those waves
As they came,
Knotting and braiding them
Into that precious
Silken tapestry…

Those clumps
Of silken tassel
I may prize apart
When I am borne
To other shores,
Alone, apart,
And out of bounds.
When night stretches before me,
Restless, pointless,
Alone, acute,
I will slowly take those strands apart,
To bring my heart
A brief repose
To bring my heart
Some slight refuge.

Prof. (Ms). Veena Singh
 (translated from Hindi by Pearl Pastakia)







Saturday, May 21, 2011

कठकरेजा

जाली  की सुतली की बुनी हुई खाट पर 
औंधे मुंह लेटा है ओरचन की पाट पर
आसमान की गोद से है जी अनसा गया 
या किस्से -कहानी का मौसम है आ गया

आवारा लड़के सा डोल-डोल रात भर
मुंह फुला बैठा है जाने किस बात पर 
गुमसुम सा उलझा है जाली के जाल से 
बाज आया चाँद भी ऐसे जंजाल से

 पर्वत वन नदी ताल पहले तो दौड़ाया
अब इतनी देर में लगता है प्यार आया
जुगनुओं की फ़ौज को मनाने  को भेजा है
आसमाँ भी ख़ूब है,कैसा कठकरेजा है।

वीणा सिंह 



खंडाला

घाटियों के बीच से
हरीतिमा की नदी बहती है
जादू की नदी अस्फुट मन्त्र कहती है.
पुरानी कहानी है
हर रात यहाँ कुछ नया होता आया है
मन्त्र के स्वर में बिंधा हुआ
आविष्ट भाव से डोलता
प्रवाह में खिंचा चला आया है 
एक   पीला पत्ता  -
इस्पात की खुरचनें समेटे 
पूरी तैयारी है 
रात सुवासित है --
फूल से, ताजगी से
धरती ने पहने
लाल श्वेत फूलों के गजरे 
चाँद है, रहस्य है, नमी है
बस एक क्षण और
धीरे-धीरे वह   
इस्पात  की केंचुल उतार डालेगा 
और मिटटी  की आर्द्रता को छूकर 
हरा हो जाएगा.  

वीणा सिंह

राहिल की पार्टी

पीपल के पेड़ पर चिडियों का राज
राहिल तुम्हारी पार्टी है आज
कौवों ने चिल्ला के तुमको जगाया
थोडी देर बाद वह खिड़की पर आया
" सबकी है तैयारी राहिल नहीं जागा ?"
"जल्दी में आज हूँ "_कहकर वह भागा

बार्बिट ने पहने हैं हरे हरे कोट
लाल टाई डाल छुपा पत्तों की ओट

गौरैयों को अपना रिंग टोन न भाया
चूँ -चूँ और ची-ची का गाना लगाया

ओरियोल ने पहनी है पीली सी ड्रेस
उसमे लगाई है काली सी लेस

कबूतर तो गर्दन फुलाता हुआ नाचे
कबूतरी के सामने प्रेम कथा बांचे

सूरज की रोशनी आ आ के झांके
सागर भी मौज में चला इठलाके

मौसी गिलहरी तो सबसे है आगे
इधर उधर सीटियाँ बजाती हुई भागे

पीपल के पेड़ पर बड़ी धूम धाम
ऐसी जमी पार्टी की क्या कहें राम !

पत्तों की प्लेट पर शोर मचा तब
“सब कुछ अरेंज्ड है , खाना दो अब”

“रुको - रुको अभी तो है मेन गेस्ट को आना”
वही तो है बेस्ट कहे सारा ज़माना
उसके आने पर रंग होगा और
जैसे बरसात में झूमे है मोर
सबने बनाया है मेन गेस्ट जिसको
हम भी तो देख लें कुर्सी दी किसको
जिसके आने पर रंग होगा और
अरे भाई किंगफिशर हम सबका मौर
सुनते ही पार्टी में नयी जान आयी
चलो भाई राहिल अब पार्टी रंग लाई

वीणा  सिंह

बरसता दिन है बारिश की नमी है




बरसता दिन है बारिश की नमी है

भीगे फूलों में लिपटी सी जमीन है

चलो इनसे भी कोई बात कर लें ।

खिड़की के बंद शीशे पार उनके

एक लता छुईमुई सी चुपके चुपके

दस्तक देती है मुलाकात कर लें ।

यों ही कमरे में हम चुपचाप बैठें

आँखें मूँद कुछ खोये से लेटें

चलें हम आज ख़ुद से बात कर लें ।

मुद्दतें हो गयीं परियों के किस्से

जो कल तक सब रहे हमारे हिस्से

उन्हें ढूंढे कोई ऐसी रात कर लें ।


वीणा सिंह 


आदिम पुत्र

हे आदिम पुत्र !
पर्वतों के विशाल कैनवास पर
श्रम भार से दुहरी पीठ किए
तुम सदा लगे मौन योगी से
कभी अपने ओसारे में धान फैलाते
कभी परिक्रमा में पीपल के
धर्म के सूत्र से बंधते ,
किसी पौराणिक कथा को बांचते ।
कभी लौह खंड सा प्रकाशमान
अग्नि - वीथिका को पिघलाते ।
संस्कारों की मुहर लगाते ,
बलि देने को उठे हाथ
प्रत्यंचा के साथ खिंचा
भ्रू -कुंचित तुम्हारा मुख !
वर्षों दुहराते रहे तुम
धर्म और क्रांति की गाथा ,
कभी शाल्मल - वृक्ष और बांसों की झुरमुट से
आती मांदल की थाप ,
अनबुझ गीत और पावों की थिरकन -
खींच लाती थी तुम्हारे पास ,
पल भर को बाँध ।
उसी एक क्षण
किसी प्रखर प्रकाश तले
अपरिचय के वलय गूँथ जाते थे साथ
लय और गान की आवृत्ति में
जुड़ जाते थे हाथ !
हालांकि तुम हंस पड़ते अक्सर
मेरे पैरों की अनाडी चाप पर ।
हे आदिम पुत्र !
स्वर्ण रेखा की धारा के साथ
करवट बदल ली है कई दशकों ने
लेकिन आज भी
बालों में सफेदी लिए और श्रम भार से झुके
तुम हो वैसे ही ।
कभी दो - चार सालों में
अचानक किसी गली में बोल उठता है
हमारे मुख का मौन स्मित ।
लगता है अभी प्रतिध्वनित होगी मांदल की थाप
बालों में बंधे पंखों की सरसराहट ,
वंश -वन के पीछे से बांसुरी की धुन .
लेकिन सुवर्ण- रेखा की छाती का ताप
कल्लौंछ बन के पसर गया है ।
तभी तो बज उठती है
हर तीज -त्यौहार पर कोई विदेशी धुन
तुम्हारे अपने ही दालान में ।
क्यों न संजो पाई तुम्हारे घर की मिटटी ,
अपनी ही धरोहर ?
बड़े हो गए हैं तुम्हारे बच्चे
पद और मर्यादा में
फिर भी आकाश को चुनौती देते
दैत्य की तरह ये काले पहाड़
मांगते हैं भीख
उसी पुरानी संस्कृति की ।
सुनो आदिम पुत्र !
ढूँढें हम दोनों फिर
उन रहस्यमय धुनों को ,
सुवर्ण रेखा की स्निग्ध धारा में सिक्त _
साथ देंगी ये मांदल की थाप का
आकाश के मौन चंदोवे के नीचे
ये इन पहाडों को मुखर कर देंगी .


वीणा सिंह

वे भी क्या दिन थे हम दर्द सुना करते थे

वे भी क्या दिन थे हम दर्द सुना करते थे
सपनों की आहट को साथ चुना करते थे
अब तो अनकही सब फिजां में ठहर जाती है
होठों से उठती है सीने में ही लहराती है
खुदा तेरी ज़मीं और आसमा का फासला क्यों है
तेरी रहमतों के बीच एक साया छुपा क्यों है
तेरी इस आजमाइश में कोई सजदे में झुक गया
तू उस बन्दे को राहत दे तो उसमें बुरा क्यों है .
 
 
 वीणा  सिंह

मत सोचो कि नीम उजली है तुम्हारी दुनिया

मत सोचो कि नीम उजली है तुम्हारी दुनिया
गिरह बंध जाए वो पहेली है तुम्हारी दुनिया
हाथ की छड़ी छूती है जब किनारों को
 उतरते ज्वार सी बह जाती है बाकी दुनिया ।
लोग बैठे  हैं ,नहीं भी मेरी महफ़िल में
उनकी महफ़िल में मैं हूँ कि नहीं सोचो क्यों
ठहर के देखो जिंदगी एक नासूर नहीं
जख्म को फूल में ढल जाने दो खरोंचो क्यों

हवा में यह वजूद जैसे गुमशुदा ख़त हो
काफी देर तक जिसका पता मिले न मिले
ओ़स की बूँद भी समंदर समाये बैठी है
बेवजह बात क्यों कि बाग़ फिर खिले न खिले
 न जाने कब तक संभालेंगे वक्त की किरचें
कदम की आहटों में ख़ाक उडेगी कब तक ?
मुझसे पूछो तो सन्नाटे को चीर के रख दे
इस जहाँ के दरो-दीवार पर तुम्हारी दस्तक .

वीणा  सिंह  

Friday, May 20, 2011

ऐसे ही सारा दिन बीता


रात जो सांकल खुली छोड़ दी 
किसी चोर से , बड़ी भूल से
छूट गई गठरी भारी ।
गठरी मन ऐसा भरमाई
उसको बिन जांचे - परखे
अपने हिस्से की सौगात समझ
जैसे ही हलके से छुआ
निकली दिन की फेहरिस्त बड़ी
सो उगती भोर की प्रथम किरण संग
मन एकदम हो आया तीता
घर की चौखट को लाँघ बढ़े
तपते सूरज के साथ तपे
कुछ धूल -गर्द , आपाधापी
बढ़ते सूरज के साथ बढ़े
सब कामकाज जिम्मेदारी
हारी-बीमारी के थे चर्चे
संदेह-शुबह का था रोना
घटते सूरज के संग -संग
देखा अपना साया बौना
ढलते सूरज के साथ- साथ
घर लौट आए क़दमों भारी
मन एकदम हो आया रीता
ऐसे ही सारा दिन बीता


वीणा सिंह 

परदेस


रोज रात समंदर में जवार जब -जब आइल
फूट गइल छाला मन के ,आँख भर आइल 

पानी में डूब गइल सपना के पिटारी 
ओकरा में रहल हमर घर अउर अटारी   

नदी -तालाब  पाटके ,हम कैसन  सपना लायब
चाँद तलक सीढ़ी मगर चाँद  हाथ   न आयब 

इ कैसन देस ह बाबा ! इ कउन माटी
अंखियन में रेत भरल जियरा  निचाटी

होरी अऊर धनिया के जे रहलन आँख के   जोती 
छूट गैलन गाँव में पीछे हीरा-मोती

अमराई नीलाम भइल,बोझ भइल दूना
सोनचिरैया छोड़ गइल ,महल-गाँव सब सूना

बिन पनहीं रेत पर अब त चलल न जाला
लाख क मनवां खाक भइल, अब कौड़ी में बिकाला

काँकर-पाथर जोड़ के ,काँकर -पाथर भैनी
आवत रस्ता याद रहे ,जावत भूल गइनी

फाग-दिवाली करत-करत दिन बीतल  कई बरसों
अब अपने सूरत गैर भइल ,कल जाईं के परसों .


वीणा सिंह




मन-मृगछौना


तुम सोचोगी मन मृगछौना कहाँ कुलांचें भरता है
पल के किसी आखेटक हाथों वह  मरने से डरता है

रात के एक अकुलाये क्षण सा अंधियारे में जाग रहा 
जाने किन किस्सों -कलियों -बागों -गलियों में भाग रहा 

तुम सोचोगी मन-प्रांतर के सारे तट अब रीते हैं 
इन्द्रधनुष के रंग धुंधले हैं ,चाँद के किस्से बीते हैं 

रूखे लोग ,ढोंग की बातें -सब साया सा लगता है
बीहड़ ,वीराना ,बेगाना नगर पराया लगता है

एक शाम को ऐसे में ,बस द्वार खोल के रखना तुम
बारिश के छीटों से गीले मृगछौने से कहना तुम -

`सोंधी धरती ,झूमती शाखें ,गुलमोहर से लाल गगन
चलो कुलांचें भर लेते हैं ,नदी-पहाड़ी-जंगल-वन


थोड़ी देर को सब भूलोगी ,नगर-परायों की बातें
ऊंच-नीच ,पथरीले रस्ते ,बीहड़-वीरानों की रातें

हल्दी-चावल के वे किस्से ,मैके के जब याद आयें
कुछ लाये ,कुछ गांठ बंधे, कुछ देहरी पर बिखराएँ

ऐसे ही जीवन में तुम कुछ रख लेना,कुछ सह लेना
`सब कुछ किसे कहाँ  मिलता है'-मृगछौने को कह देना. '


वीणा सिंह



Saturday, April 30, 2011

छोटी लड़की—बड़ी लड़की

छोटी लड़की
आँचल के छोर से बंधी
उँगलियों के जोर से सधी
चाँद के जादू से डरी
प्रेत के किस्सों से भरी
गुडिया पिटारा रखती
नीम निम्बौरी चखती
चौखट - दालान की मिट्टी
ऊंची फ्राक से चिपटी
छत पर आँखें मटकाती
साड़ी पहन के शर्माती
कसी गुंथी चोटी
डरी सहमी छोटी

बड़ी लड़की

आँगन दालान बंधी
आंखों के जोर सधी
चाँद का जादू है
रात बेकाबू है
छत की कड़ियाँ गिनती
मुश्किल घड़ियाँ गिनती
दीवारों को तकती
दीवारें उसको तकती
हर धड़कन आहट है
हर आहट उलझन है
हर किस्सा अपना है
हर अपना सपना है
बाहर जमाना है
लोगों का ताना है
ऊंची है ताड़ सी
 
बढ़ती है बाढ़ सी
कैसी मुहजोर है
कैसी सहजोर है
खाट पर लेटी है
मन ही मन ऐंठी है

चुपचाप सुनती है
मन ही मन गुनती है
- डरी सहमी लड़की

वीणा सिंह 

Wednesday, April 20, 2011

रंग



रंगों की रंगोली है
तितली ने जो घोली है
बाग़-बगीचे फूल-फूल
कोयल की मीठी बोली है

कोई एक चितेरा है
आसमान पर डेरा है
अपनी कूची से लाल रंग
पूरब-पश्चिम में फेरा है

दिन सोने में नहाता है
रातें चाँदी में हैं चमचम
नीला आकाश पीला सूरज
हर रंग में रंग जाते हैं हम

रंग-बिरंगी धरती है
लोगों से यह कहती है
हर रंग में रंगा संसार है
पर सबसे सुंदर प्यार है।

वीणा सिंह  
(राहिल और रेहान के लिए दादी की रचना)  

Wednesday, March 16, 2011

किंगफिशर



मैं ने अपनी उधार की जिंदगी
मुट्ठी में भींच ली है
और
खुले आकाश के नीचे
उसे कैनवास की तरह फैला दिया है।
मेरी आँखें जूम लेंस की तरह
स्कैन करती हैं
पेड़ों- पत्तों-शाखों को
कुलेलों को हलचल को ।
किसी गुप्त कोने में
छुप कर मैं हथेली खोलती हूँ -
वहां बंधी है शगुन के रंगों वाली पोटली ।
मैं ढूँढती हूँ उनमें तीन रंग
- नीला , कत्थई और सफ़ेद ।
मेरी आंखों में
फिरोजे का रंग उतर आता है
जो आकाश और समंदर को तलाशता है ।
आज वायु नम है
अस्वाभाविक है यह
पर सूर्य की रोशनी का पता नहीं ।
मुझे प्रतीक्षा है
उसी रोशनी की ।
उसके उगने पर पूरी कायनात बदल जाती है -
बगुलों के सफ़ेद रंग पर
सुनहली पन्नियों का रंग चढ़ जाता है ,
धूप में उड़ती उनकी जमात
ऐसे झिलमिलाती है
जैसे खिड़की खोल कर
किसी बच्चे ने फेंक दी हो
सुनहले कागज की पन्नी
कैंची से काट कर,
कबूतरों की गर्दन इन्द्रधनुषी बन जाती है
और पीपल के झूमते पत्ते बन जाते हैं
मानिक के झुमके ।
तुम भी तो शायद प्रतीक्षा में हो उसी धूप की ?
तभी रोशनी के बढ़ने तक
छिपे रहते हो किसी पर्ण गह्वर में ।
रोशनी के साथ ही
तुम खुल जाते हो
रंगों की पोटली की तरह ।
अनेक हलचलों के बीच भी
हम दोनों एकस्थ हैं -
समंदर की बिछी काई की ओर देखते।
थोडी ही देर में
साफ़ पानी छा जाएगा
धीरे-धीरे उसकी सतह पर,
तब
तुम तोलने लगोगे अपने पर ।
और तब मैं
किसी मचान पर बैठे
शिकारी की तरह
भूल जाऊँगी सारे अनावश्यक दस्तक
तमाम वनिक वृत्तियों को
पुराने लिबास की तरह उतार फेंकूँगी
तेज़ कर लूंगी
अपनी आत्मा के औसान ,
धूप में झिलमिलाती
उस नीली उड़ान को
शगुन की तरह
कैद कर लूंगी अपने अन्दर । 


वीणा  सिंह



महानगर की सुबह

महानगर की सुबह बौराती है
घड़ी के काँटों पर टंगी बासी कमीज़ सी 
आँखें चुराती है
फैला है दिन सामने
खाली मैदान सा
बूढे-बुजुर्ग  सा दिलासा दे जाता है
मन को सहलाता है
शाम को सिकुड़ जाता है
किसी फ्लैट के दालान सा
गठिया की मारी
रात दुखियारी
झरती बूँदें ओढ़े 
दुखते घुटने मोड़े 
कल  की सुबह
जूठे बर्तन सी मुंह बिराती है .


वीणा सिंह 


सद्यप्रसवा

सद्यप्रसवा स्त्री
पार्श्व में लिए बैठी है
अपने शिशु को
निढाल , पर आश्वस्त
हाथ फिराती है
टटोलती है
अपने ही रक्त और मज्जा से उत्पन्न
नवजात को निहारती है
विचारों और भावनाओं की
केलि से प्रसूत
कृशकाय शरीर को समेटती है
अच्छा लगता है
महीनों तक
गर्भिणी नदी के पाटों
और
भरे हुए बादलों में होनेवाले
प्रकम्पन के भय से
बंध्या की कुंठा से
दोषमुक्त हो
दीवार के उस पार की हलचल पर
ध्यान नहीं देती
मुंह फेर कर
आराम से सो जाती है


वीणा  सिंह