Saturday, December 10, 2011

रेशम के गुच्छे

सब देखा - गुम्बद, मेहराब, परकोटे
धूप आकृतियाँ बुनती
छत पर आलसी बिल्ली सी
पंजों के जोर उचकती
यहाँ-वहाँ पर बिखरे बेबाक कहकहे चुनती

सब देखा- सूने गह्वर-विवर
रहस्यमय संकेतों में घिर
कपोतों के संग युगल
युगलों की शाश्वत भाषा
मन की ऊँची प्राचीरें
अगम्य-बोध नदी तीरे
गढ़ती नई परिभाषा!

देखा अंधेरे का चुपके
प्रकाश द्वार पर विलयन
तारों से जड़े चंदोवे में
नयनों का उन्मीलन
देखा कोहनी पर झुका चाँद
प्रांगण में झरती चाँदनी
मौसम के संग हो एकतान
गुनगुन करती रागिनी
रागों में घुलती यामिनी

देखा भित्तियों दीर्घाओं में
कलाकृतियों का इतिहास अमर
अनवरत कोलाहल के बीच
अगरु-धूम सा मंत्र मुखर
अन्त:सलिला सी पाटों में
कितनी बातें मौन रहीं
कितनी सदियाँ चुपचाप बहीं।

सब देखा
दिन-रात की बुनी चटाई पर
मौसम को बैठे-बैठे
गिनते रहना पहरों को
रेशम के गुच्छों में बंधकर
आती जाती लहरों को

सीमाबंदी के पार खड़ी
जब कभी अकेली हो जाऊँ
विह्वल उदास हो रात बड़ी
तब चुपके से एकांत में
रेशम के गुच्छे खोल-खोल
मैं अपना दिल कुछ बहलाऊँ
मैं अपना दिल कुछ बहलाऊँ

वीणा सिंह 

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