Tuesday, March 24, 2026

चाँद और टीवी

 

चारों ओर फूल खिले हैं

ठंडी ठंडी हवा चली है

आसमान में भीड़ लगाये

तारों में यह बात चली है

 

बहुत दिनों से न जाने क्यों 

चाँद अकेला- सा रहता है

पीला-पीला चेहरा लेकर

जब देखो सोया रहता है

 

रजनीगंधा, जूही, चम्पा 

जब सब उससे मिलने आईं

चाँद की बढ़ती बीमारी से 

मन ही मन बहुत घबराईं 

 

सबसे अलग-थलग रहकर वह

मोटे आँसू बहा रहा था।

बादल की चादर ओढ़े वह 

अपना चेहरा छुपा रहा था

 

आख़िर सबने पूछ-पूछकर

पाँव पकड़ कर हाथ जोड़कर 

पूछ लिया क्यों वह रहता है

सब लोगों से मुँह मोड़ कर

 

रजनीगंधा, जूही, चम्पा 

चाँद की चिट्ठी लाती होंगी 

दिनभर क्यों हो घर के अन्दर 

राजा को समझाती होंगी

 

चाँद की याद नहीं आती है?

जब देखो तब टीवी टीवी

राजा कितने बदल गये हो

तुमसे कुट्टी, तुमसे कुट्टी ।

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

रपुनजल

 

राहिल को जब चढ़ा बुख़ार 

एंटिबायटिक्स दिये हज़ार 

घर में रहकर वह चकराया 

इधर-उधर बस बौराया

दिन भर विस्तार पर पड़ा रहा

ज़िद्दी घोड़े सा अड़ा रहा।

 

करना है समथिंग समथिंग

लाइफ़ हुई बोरिंग-शोरिंग

लेकिन वह समथिंग क्या हो?

आइडिया टिंग टिंग क्या हो?

 

एक विचार मन में आया

बाहर दरवाज़े पर आया

 

हरी घास की चादर पर

फूल-फूल पर क्यारी पर

एक तितलिया उड़ती थी

हर क्यारी में मुड़ती थी।

 

सोने का टुकड़ा चमक रहा

रूप धूप में दमक रहा।

क्यों न रहे वह मेरे संग!

मैं रंग जाऊँ उसके रंग!

 

यही विचार मन में जागा

राहिल तुरंत घर में भागा।

लकड़ी का बक्सा बनवाया

फूलों पत्ती से सजवाया ।

घास का विस्तर लगवाया

सिरहाने पानी रखवाया।

मुट्ठी में बन्द किया तितली को।

बक्से में बन्द किया तितली को।

 

सुबह बक्स को खोला जब

तितली नज़र न आयी तब

राहिल बड़ा हैरान हुआ

मन ही मन परेशान हुआ

धीरे से बक्सा उठवाया

हरी घास पर रखवाया

कोने में बिल्कुल मुरझाई

तितली तभी नज़र आयी।

सूरज भी था आँखें मींचे 

ऊपर से देख रहा नीचे

फिर धीरे से आँखें खोलीं

फूलों ने भी पाँखें खोलीं

अपनी किरणों से नहलाया 

तितली के पंख को सहलाया

तितली उड़ कर आज़ाद हुई

रपुनजल की कहानी याद हुई।

 

 

 

 वीणा सिंह 

 

 

 

 

 

Monday, March 23, 2026

लॉकडाउन

 

 

हँसी की पिटारी में 

ताले जड़े हैं,

बादलों के पंख

ख़ुद से उलझे पड़े हैं ।

मन की दीवारों पर

स्कूली क़वायदें 

दौड़ रहे सपने

धूल फाँकते खड़े हैं।

आँखों को इजाज़त है, 

बस ज़रा सा बोल लें

मुखौटे पहन ज़ुबान 

बेज़ुबाँ पड़े हैं।

नई लिखी जा रही हैं

कलजुगी इबारतें,

धुले-पुँछे बोर्ड सब

कोने में खड़े हैं।

दुनिया फ़िक्रमंद है,

अब हश्र भला होगा क्या

सब्र की रस्सी बँधे

सारे नट चल पड़े हैं।

खामोशियाँ बोलती हैं,

सुना था किसी दौर में,

इन्सान तो ख़ामोश है,

मुर्दे बोल पड़े हैं।


वीणा सिंह 

 

 

Monday, March 9, 2026

बोनसाई

 बगीचे के कोने में

या ड्राइंग रूम की मेज़ पर

तुम सब ने सजाये हैं

अपने अपने बोनसाई 


मिट्टी और खाद थोड़ी 

जीने को आकाश थोड़ा 

नमी और उजास थोड़ी 

हवा और वातास थोड़ा 


काल की फैली हुई 

बाँहों को काट कर

आकाश को छूती हुई 

टहनियाँ छाँट कर 


तारों से गुँथीं-कसी

सुनिश्चित राह हो,

हमारी हर ग्रन्थि में

तुम्हारी ही चाह हो ।


नपा तुला आकाश हो

नपी तुली सृष्टि हो

हमारे संवर्धन में

तुम्हारी ही तुष्टि हो।


“विरूप है पर ख़ास है

नयेपन का वास है।

इसकी हर ऐंठन में

कला का आभास है।”


प्रशंसित , अभ्यर्थित

अपने गर्व में गर्वित 

तुम सब ने गढ़े हैं

हम जैसे अनेक नन्हें बोनसाई ।


वीणा सिंह