Friday, November 13, 2020

फागुन


सखि आमों की बौर में फागुन लहराया 

पात -पात फूल -फूल इन्द्र धनुष छाया

अलसाये दिन आए भीगी- सी रातें 

फागुन की ताल पर  विरहा की बातें 

कोयल की कूजन  में मन भरमाया 

लता बेलि फूली है बातास  उमगा 

मनवा पहाड़ हुआ भोर रतजगा

टटकी सी आँच में गुलमोहर सरसाया 

टेसू की   आग जरे वन-पहाड़ सारे 

व्याकुल सा आधी रात पाखी टिटकारे

द्वारे पड़ी पाती पर पाहुन न आया 

सखि आमों की बौर में फागुन  लहराया।

 

सखि तुमने खूब कही फागुन की बात 

हम तो दिहाड़ी पर मज़दूरों की जात

फिर भी दिखे रहें कुछ लाल-हरे पत्ते 

बिलकुल  बेनूर जैसे कागज़ के गत्ते 

कहीं-कहीं भूल से कोई फूल मुस्काया 

जैसे गलती से कोई पराये देश आया 

आकाश राख सा  न बादल के पहरे 

सब के सब जैसे दिल पर जा ठहरे

ऊष्मा अगर हो तो सावन कहीं बरसे 

रस के हो छींटे तो तो फागुन भी सरसे 

जैसे कोई कर्ज़ हो पिछले जनम का 

होठों पर ठहरा हो साया गुमसुम सा 

रात दिन बैरी समय बैठा दरवाज़े 

मूल पर सूद -पर -मूल धरे साजे

अंतर के दाह बीच फागुन ऋतु आयी

एक साथ चल रही दोनों  की पहुनाई।

 

वीणा सिंह                              

Thursday, November 12, 2020

शायद हम उन दिनों

 शायद हम उन दिनों

जीते थे ख़्वाब में 

कोई सवाल ले

डूबे थे आप में 

 

लोग ये कहते हैं 

मैं ही वाक़िफ़  न था 

वरना कुछ देर को 

मौसम बदला तो था 

 

उंगलियाँ थामकर 

घण्टों थे  साथ हम 

दरिया किनारे पर 

देर गई रात हम 

 

कितने तूफ़ान उठे 

मैं ही बेफिक्र था 

वरना कुछ देर को 

मौसम बदला तो था

 

कब धरती हरियाई

कब मौसम लाल था 

अपने ही दिल में 

जवाब था सवाल था

 

कितने अरमान उठे 

मैं ही वाक़िफ़ न था

अपने ही दिल में 

मौसम बदला सा था 

 

दिल में कोंपल खिली

निंदयाई अधजगी 

एक जादू सी बँधी 

अरुणाई में रंगी 

 

लोग ये कहते हैं कि 

मैं ही वाक़िफ़ न था

मैं तुम से कहता हूँ

मौसम बदला तो  था      


वीणा सिंह              

वसंत

 

ना कोई कूक है ना कोई मंज़र 

बेचैनी गहराए अंदर ही अंदर 

 

भूले हुए राही को देकर टहोका 

बौराए फागुन ने रस्ता है रोका 

 

यादों के क्षितिज पर लहकाई आग 

जैसे पलास वन खेल रहे फाग

 

बंद दरवाज़े की सांकल पर हाथ धर

अलमस्त मौसम ने रातों को टोककर 

 

कोई पुराना कर्ज़ -ऋण माँगते

असमय हिसाब के खोल दिए खाते 

 

मौसम महाजन  बेवक्त ही आया 

पूंजी के नाम पर शेष भी  गँवाया

 

ज़ख़्मों में हाथ डाल पीड़ा को छूने

अनुरागी सूद हुए पहले से  दूने।

 

वीणा सिंह                                    

चुरा के लाए हैं दो -एक साँस

 चुरा के लाए हैं दो -एक साँस

बेसब्र ज़िंदगी की बस्ती से 

सुकून की एक नदी को पार करें 

आज इसी पुरानी कश्ती से।

 

वक़्त के सबसे नीचे ख़ाने में 

एक चादर वहाँ पड़ी होगी 

आज हम उसको ही बिछाएँगे 

बेल-बूटों से वह जड़ी होगी।

 

उन तारों ने सहेज रखे हैं

न जाने कितने कहकहे अपने 

जिन्हें तुम फूल-पत्ती कहते थे 

वे ही रेशमी पल रहे अपने।

 

दरम्यान उन रेशमी तारों के 

तुमने एक लाल बूटा देखा है 

बड़ी लंबी वह राजदारी है 

बड़ी मुश्किलों का लेखा है।

 

सब ने अपनी तरफ़ से कोशिश की 

हर तार, तार-तार करने की 

हमने ताक़त बचाके रखी है 

हर बूटे में प्यार  करने की।

 

न जाने कितनी कोशिशों से हमने 

बचा रखी है कोशिशें अपनी 

कैसी सर्द हवा के झोकों में 

छुपा रखी है आतिशें अपनी।

 

आज सब काम काज रहे बाक़ी 

सहेजें उन सलवटों  को पहले

वक़्त की चोट से जो अनछुई 

वक़्त की उन  करवटों को पहले।

 

वीणा सिंह         

कुछ यूँ शुबहा होता है

 कुछ यूँ शुबहा होता है 

ज़िंदगी गुस्ताख़ हुई जाती है 

कोई रुका रहे उसकी जानिब

अपनी रौ में बही जाती है 

 

किनारे धूप में बैठे रहो 

एक क़तरा मयस्सर ही नहीं 

दर्द का  एक झरता चश्मा है 

जैसे उसपे कोई असर ही नहीं 

 

अधखिली धूप है खिले न खिले 

रेत है हाथों से छूट जाती है 

किसी जवाब की उम्मीद नहीं 

बढ़ती लड़की से निकल जाती है    

 

वीणा सिंह 

एक अरसा हुआ ख़ुद से मिले

 एक अरसा हुआ ख़ुद से मिले 

किसी तन्हाई में ठहरे -बैठे

हर घड़ी एक ख़याल आता है 

ज़िंदगी का सवाल आता है

 

ये परिंदे दरख़्त फूल- पत्ते 

सब उड़ते हुए से  रंग -धब्बे

बारहा सोचा है रफ़्तार कम कर लें 

किसी क़िस्से पर आँख नम कर लें

 

एक चौखट में क़ैद है तब से 

एक गूँगा सा वक़्त जाने कब से 

उसे भी आसमाँ दे, वह  पर तोले 

गुनगुनी रात में वह भी बोले 

 

यह रात दिन जो है तराशा हुआ 

पीला ज़र्द वक़्त कि है नपा -तुला 

खिड़कियाँ खोल दें  कि आसमाँ निकले 

कि आसमाँ के पार का समाँ निकले                     

भविष्य अजन्मा नहीं है

 भविष्य अजन्मा नहीं है

इस अंधे कुएँ की गहराई मैंने  माप ली है 

गोटियाँ बिछ चुकी हैं, परिणाम मुझे मालूम है 

उंगलियों के बीच दबा यह मोहरा 

और कुछ नहीं मेरा संस्कार है 

जो प्रत्युत्तर में मेरे पास वापस लौट आया है ।

तुम्हें मालूम नहीं कितने दंश  देती मेरी आस्था 

पूरे मन प्राण पर छा गई है 

ऊँची कँटीली चहारदीवारी  उठाकर 

चारों ओर से घेर कर बैठ गयी है।

हर काँटा एक फन है

और मैं इस आश्चर्य में हूँ

कि क्या ऐसा भी होता है 

कि जो आस्था ताउम्र तुम्हें पालती रहे 

वही तुम्हारे देखते-देखते

रूप बदलकर नागपाश हो जाए ? 

फिर भी मेरा संस्कारी मन 

इसे पत्थरों से मार कर 

अपने बचाव का इंतज़ाम नहीं करता।

मेरी ठिठुरती  दहशत इस प्रतीक्षा में है 

कि यह खुदबखुद मेरा रास्ता छोड़ दे

और असहजता इस प्रयास में है 

कि वह इस बाड़े को तोड़कर

उन्मुक्त हो सके 

क्या सचमुच बढ़ती हुई उम्र की तरह

सारे सपनों की यात्रा 

एक ही दिशा में होती है——- ढलान की ओर?

दिन रात अपने ही आंगन में क़ैद 

किसी प्रेत की तरह 

मैं अनसुनी आवाजें टटोलती हूँ 

पर मुझ तक पहुँचने के पहले ही 

वे अपनी सारी ऊष्मा खो देती हैं

किसी साए से छूकर सर्द पड़ जाती हैं।

 

वीणा सिंह                             

भ्रम ही सही

 भ्रम ही सही

पर आसान नहीं झेलना 

असह्य यंत्रणा उस छोटे से क्षण की 

जब लगे जैसे तुम्हारे ही कारण 

तुम्हारी हथेली का आकाश 

कुछ और सिमट आया है

तुम्हारे ही हाथों संभव है यह

मसीहा बनकर चुपचाप दे देना 

अपने रक्त का एक-एक कण 

किसी और के स्वप्न के लिए 

पर विश्वास मानो

समर्पण की यह यातना 

मैंने अकेले ही झेली है क्षण-अनुक्षण

ग्रहण करते वक़्त अपनी पूरी प्रक्रिया में

निःशेष होती यज्ञ की अग्नि में 

जब प्रश्न हो समक्ष दुविधा भरे चुनाव का

तब संभव हो तुम समझ लो विवशता 

अपने ही हाथों अपनी 

सबसे प्रिय वस्तु की बलि का 

पर व्यथा — इस अनचाही हत्या की

नहीं समझ पाओगे 

शायद एक अलग अस्तित्व होता हो 

हर एक संवेदना का 

एक सही स्थिति भी 

एक अपना ही दर्द उसका 

और एक वक्त उसे मेटने का

पर यदि उसे देना चाहो

कोई भी अनचाही स्थिति

तो वह, वह नहीं रहकर

पथरा जाती है या बदल जाती है 

थोड़ा और दर्द लेकर

किसी दूसरी ही संवेदना में

इसलिए क्षणांश का भ्रम  ही सही 

बहुत बार सही है मैंने भी व्यथा 

अपने ही हाथों अपने आकाश को 

विस्तार देने की चाह में 

अगणित खंडों में बाँट देने की।

 

 

वीणा सिंह                  

डायरी लिखने पर

 

निस्तब्ध मौन पड़े रहने दो इन्हें 

मेरी अंगुली थामे — निरापद

मेरे ही अंतस में 

शब्दों के दुर्बल कंधों पर 

किसी क्षण का बोझ मत डालो 

रंगे हुए पृष्ठों  की यह दूरी 

और कुछ नहीं आडंबर है 

या फिर एक प्रचलन हास्यास्पद !

इस मरुयात्रा ने कोमलता के नाम पर 

बार बार छला है 

दुहराई है वे  ही यातनाएं 

रहने दो इन्हें यहीं— निष्कंटक 

इस निर्जन वीथिका में मुक्त 

किसी भी आततायी  के पदचाप से 

एक इतिहास कुहरा ढँका

चुपचाप अपने आप में अवगुंठित!

 

वीणा सिंह         

ज़िन्दगी

 


ले रहा हो छंद जब  आकार कोई मन में

इंद्रधनुषी सपनों का हास लगे ज़िंदगी। 

 

राह बाट पंकिल हो बोझ थोड़ा मुश्किल हो 

नेह ज़रा मिल जाए तो आस लगे ज़िंदगी ।

 

सुख- दुख की बात हो, कुछ मुक्त अट्टहास हो 

अपनों के घेरे में आकाश लगे ज़िंदगी ।

 

चीन्हे हाथों का जब पहरा हो सपनों पर 

छटपटाती मीन की साँस लगे ज़िंदगी ।

 

सब कुछ पुराना है – रटते  हैं रात दिन 

जाने कब हो  ऐसा,  ख़ास लगे ज़िंदगी ।

 

पहचानी आहट हो जब चेतना के दरवाज़े 

कभी -कभी बेले का उजास लगे ज़िंदगी ।

 

अल्बम पुरानी हुई, फिर भी देखें ज़रा 

यहीं कहीं शायद आस -पास लगे ज़िंदगी ।

 

 

वीणा सिंह                  

Wednesday, November 11, 2020

शब्दान्वेषण

 

चौड़े पाटों वाली नदियों को खोजते-खोजते 

शब्द गुम हो गए हैं कहीं पानी की सँकरी पगडंडियों में 

और हम उन्हें खोजते फिरते हैं। 

सफ़ेद मुर्दा दीवारों में टिक- टिक करती घड़ी 

कमरे में अधलेटी रिक्तता

रक्त के क़तरे सी फैलती 

ठक -ठक हथौड़े की चोट करती खाँसी 

या आँगन के कोने में मख़मली संवेदन जगाते गुलाब !

सब नज़रों  के आगे से गुज़र जाते हैं चुपचाप 

एक अनचाही पंक्ति बनकर ।

कल्पनाएं मौन पड़ी हैं रक्तरंजित

कँटीली साड़ियों में बिंधी 

रह रह कर सब पूछते हैं ——

क्यों नहीं तुम भी जीते हो पहाड़े रटते बच्चों की तरह 

या जाड़े की धूप में अलसाई देहों को सेंकते!

सृजन के इस सुख को मगर कैसे समझाएँ तुम्हें !

क्यों साथ-साथ  चितेरे बादलों   के  

रुकता  ठहरता दौड़ता मन वहीं जाना चाहता है 

जहाँ किसी शापग्रस्त राजकुमारी की तरह 

अनजान ऊँचे क़िले में क़ैद है

कोई कहानी, कविता या पंक्ति —

अगम सागर तल में सीपी-सा  

किसी पारदर्शी स्वप्न मुक्ता को प्रतीक्षारत 

और हम उन्हें खोजते फिरते हैं।

 

वीणा सिंह                       

साँझ

 

आँखों की कोरों में धुंध उतर आई

किसने ये गीली लकड़ियाँ सुलगायी।

 

देहरी पर थकी थकी बैठी है साँझ,

सुधियों के आँचल को फैलाए,

हीरे माणिक मोती बिखराए,

रत्नों के द्वीप में फिरती है साँझ ।

 

ऊँगली की छाँहों से छूटकर 

गलबहियाँ डाले दो बौने साये

अनजानी पगडण्डी दौड़ चले

हँसते बतियाते उमगती है साँझ ।

 

सपनों के देश को छू आए साये

आदमक़द  आहट से घर वापस आए

चौखट और देहरी के बीच में जड़ी हुई

लम्बी परछाई टटोलती है साँझ।

 

आँखों की कोरों में धुंध उतर आई

किसने ये गीली लकड़ियाँ सुलगायी।

 

 

वीणा सिंह