बचपन में खेलते थे एक खेल
संगीत की द्रुत लय के साथ
तेज चलते-चलते
वर्तुलाकार घेरे में
अस्तित्व बचाने का खेल।
बाहर-भीतर के शोर से मुक्त
समस्त चेतना उस संगीत को टटोलती
बन जाती थी – एक रोमांच
एक जिजीविषा,एक जीत!
कभी हार भी!
तेज चलते-चलते रुक जाएगा संगीत
अभी? कभी भी! अचानक!
सारी संवेदना बन जाती थी – प्रश्न!
घेरे के भीतर रह जाने का उल्लास?
या पाषाण बन जाने की वेदना?
आज भी चलता है वह खेल----
किसी एक क्षण पर पड़ जाती है
एक अदृश्य मोहिनी
सारे शोर को चीर कर
बज उठता है सन्नाटा
और एक जादू की तान
अदृश्य पंजों से पसरती चली आती है।
तर्जनी की तरह यह तान
उठेगी,रुकेगी और किसी एक क्षण को
पत्थर कर देगी।
चेतना को मुट्ठी में भींच
धड़कते सन्नाटे के शोर में
फिर वही रोमांच, वही जिजीविषा-
घेरे के भीतर या बाहर?
अदृश्य लिबास में कोई जादूगर
हमारे बीच रहकर
हमसे ही सीखता रहा यह खेल
और वही सब दुहराता है।
वीणा सिंह
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