कुछ यूँ शुबहा होता है
ज़िंदगी गुस्ताख़ हुई जाती है
कोई रुका रहे उसकी जानिब
अपनी रौ में बही जाती है
किनारे धूप में बैठे रहो
एक क़तरा मयस्सर ही नहीं
दर्द का एक झरता चश्मा है
जैसे उसपे कोई असर ही नहीं
अधखिली धूप है खिले न खिले
रेत है हाथों से छूट जाती है
किसी जवाब की उम्मीद नहीं
बढ़ती लड़की से निकल जाती है
No comments:
Post a Comment