Thursday, November 12, 2020

कुछ यूँ शुबहा होता है

 कुछ यूँ शुबहा होता है 

ज़िंदगी गुस्ताख़ हुई जाती है 

कोई रुका रहे उसकी जानिब

अपनी रौ में बही जाती है 

 

किनारे धूप में बैठे रहो 

एक क़तरा मयस्सर ही नहीं 

दर्द का  एक झरता चश्मा है 

जैसे उसपे कोई असर ही नहीं 

 

अधखिली धूप है खिले न खिले 

रेत है हाथों से छूट जाती है 

किसी जवाब की उम्मीद नहीं 

बढ़ती लड़की से निकल जाती है    

 

वीणा सिंह 

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