पारे जैसी जगमग
सुबह के तरल जल
मनमौजी किश्तियाँ
पालों को तानकर
ऊब-डूब करती हैं
फैले मानस-तट पर
बेवजह टहलती हैं
लहरों पर यों ही
बहलती-मचलती हैं।
आँखें हों निंदियारी
सुनसान दुपहरी
आवारा घूम-घूम
मन के किनारे पर
किंचित् ठहरती हैं
एकाकी साँझ में
व्यथा के भार से
भरे हुए बादल सी
आँखों में रेत भर
लहरों पर तिरती हैं।
बूँदों के ज्वार में
हहराते सागर में
रातों को भीगती
अनजानी रज्जु से
बँधी-बँधी फिरती हैं।
मन की ये किश्तियाँ
निचाट रातों में
मेरे एहसास पर
फुलकारी से सजी हुई
झीने दुपट्टे सी
हौले से गिरती हैं।
वीणा सिंह
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