Thursday, November 12, 2020

एक अरसा हुआ ख़ुद से मिले

 एक अरसा हुआ ख़ुद से मिले 

किसी तन्हाई में ठहरे -बैठे

हर घड़ी एक ख़याल आता है 

ज़िंदगी का सवाल आता है

 

ये परिंदे दरख़्त फूल- पत्ते 

सब उड़ते हुए से  रंग -धब्बे

बारहा सोचा है रफ़्तार कम कर लें 

किसी क़िस्से पर आँख नम कर लें

 

एक चौखट में क़ैद है तब से 

एक गूँगा सा वक़्त जाने कब से 

उसे भी आसमाँ दे, वह  पर तोले 

गुनगुनी रात में वह भी बोले 

 

यह रात दिन जो है तराशा हुआ 

पीला ज़र्द वक़्त कि है नपा -तुला 

खिड़कियाँ खोल दें  कि आसमाँ निकले 

कि आसमाँ के पार का समाँ निकले                     

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