Sunday, November 8, 2020

रोबोट



चौंधियाते प्रकाश,

कर्कश ध्वनि और 

नियोन लाइट के संकेतों 

के बीच,

मैं अपने आप को महसूसती हूँ

किसी अन्य ग्रह के प्राणी सा

जो गलती से भटक आया है यहाँ!

छिलते कन्धे, चुभते वाक्य-वाण,

अनुत्तरित चित्त और प्राणों का पित्त

जो उछल कर बह आएगा

सड़कों पर कभी भी!

अनेक आधुनिक सूत्रों से बँधा

वह जा रहा है , आज का आदमी!

—एक रोबोट की तरह

एक ख़ास गति में बद्ध,

अपने आप को व्यक्त करता 

नवीनतम संकेतों से,

वह अपने हाथों में लिए चलता है

अपना ही दिमाग़!

असंख्य की संख्या में—

सारे एक जैसे हैं—-

किसी प्रदर्शनी में दीवार पर सजे

एक ही आकार के चित्रों की तरह,

जिन्हें देखने के बाद भी, 

कुछ याद न रहे।


वीणा सिंह 

 

 

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