Sunday, November 8, 2020

अग्निपंखी

 बहुप्रतीक्षित अग्निपंखी!

मौसम की करवट के संग-संग

एक प्रभामयी उजली भोर रंग,

बन्द झरोखे दस्तक देती—-

श्रांत-शिथिल पंखों से अपने, 

मेरे दुराग्रही स्वप्न ले,

सुदीर्घ—वर्तिष्णु, प्रतिवेशिनी,

संकेतों से बातें करती है,

प्रतिबंधित मेरी स्मृति-अर्गला

—करती नित नूतन आघात!

जाने कितने अनथक प्रयास!

व्यग्र—चेष्टारत, वर्तुलाकार!

मधुरिम पलों के विगत साक्ष्य-

कुछ जीर्ण, पत्रविहीन तृण!

कुछ पुष्प, धूसरित हैं मलिन!

धर देती है, रोज़ निरन्तर 

जैसे पूजा के उपादान!

इसी तरह वह दस्तक देती

—खोजा करती अपनी धरती!

मेरे मन के धूमिल कक्ष में

छोड़े जाती है यक्ष प्रश्न!

बस क्षण भर को मेरा भी

अस्तित्व मुखर हो जाता है,

अपने हिस्से का आकाश पा जाता है।


वीणा सिंह 

 

 

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