Thursday, November 12, 2020

वसंत

 

ना कोई कूक है ना कोई मंज़र 

बेचैनी गहराए अंदर ही अंदर 

 

भूले हुए राही को देकर टहोका 

बौराए फागुन ने रस्ता है रोका 

 

यादों के क्षितिज पर लहकाई आग 

जैसे पलास वन खेल रहे फाग

 

बंद दरवाज़े की सांकल पर हाथ धर

अलमस्त मौसम ने रातों को टोककर 

 

कोई पुराना कर्ज़ -ऋण माँगते

असमय हिसाब के खोल दिए खाते 

 

मौसम महाजन  बेवक्त ही आया 

पूंजी के नाम पर शेष भी  गँवाया

 

ज़ख़्मों में हाथ डाल पीड़ा को छूने

अनुरागी सूद हुए पहले से  दूने।

 

वीणा सिंह                                    

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