ना कोई कूक है ना कोई मंज़र
बेचैनी गहराए अंदर ही अंदर
भूले हुए राही को देकर टहोका
बौराए फागुन ने रस्ता है रोका
यादों के क्षितिज पर लहकाई आग
जैसे पलास वन खेल रहे फाग
बंद दरवाज़े की सांकल पर हाथ धर
अलमस्त मौसम ने रातों को टोककर
कोई पुराना कर्ज़ -ऋण माँगते
असमय हिसाब के खोल दिए खाते
मौसम महाजन बेवक्त ही आया
पूंजी के नाम पर शेष भी गँवाया
ज़ख़्मों में हाथ डाल पीड़ा को छूने
अनुरागी सूद हुए पहले से दूने।
वीणा सिंह
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