बिजली- सी कौंधी
और एक सन्नाटा खिंच गया
सब कुछ अनुशासित था
हाव-भाव, भीड़, मौन
मौन के उस पार भी
एक रहस्यमय शक्ति
रहस्य के कुहरे को चीर कर
उस तक पहुँचने का आयोजन था
वर्जनाएँ थीं, संकेत थे
होंठ हिल रहे थे अस्फुट
तभी एक स्वर संकेत सा लहराया
और वह मार्गदर्शन बन गया
और अब एक नारा बना
तेज- और तेज- प्रचंड
स्वर की सीढ़ियाँ फलांग कर
स्वर्ग को जमीन तक उतारने की स्पर्धा
शब्दों का तीव्र आलोड़न
कामनाओं के आवेदन
रहस्य की सृष्टि, चमत्कारों की वृष्टि
और फिर------ सब ओर शांति!!!
भावों और शब्दों के तने हुए रस्से पर
घंटों से चल रहा था एक प्रदर्शन
अब सब कलाबाज पस्त पड़े थे
अदृश्य के नाम की रस्सी से मुक्त हो
हाँफते खड़े थे
जो भी था,
अपने बौनेपन का अहसास था
विराट के समक्ष
लघुता का आभास था
मंत्र की तरह दुहराया जा रहा था
समूह के प्रति प्रतिबद्धता का आदेश
बिखर गया अब तक का एकांत निवेदन
व्यस्त क्षणों में, अनभ्यस्त हाथों से
अंजुरी में समेट कर रखा गया
अस्था का दीप।
लेकिन ठहरो
आतिशबाजी के क्षणिक प्रकाश की तरह
समाप्त हो जाएगी बिजली की यह कौंध
लघु मानव का यह दैन्य निवेदन ही
मन-प्राण को आलोकित करेगा।
वीणा सिंह
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