Sunday, November 8, 2020

मेघ-मल्हार



अँधियारी सुनसान रात में
हल्की सी  थी  दस्तक
मेघों के संग  जाग रही
उदास  रात थी अब तक.
       कब से  जिनको  सँभाला था-
       जज़्बातें   थीं   मन   की!  
       टप-टप  टपकी  बूँदें थीं  या
       सिसकी  थी   श्रावण   की?
थाम रखा था जाने उसने
कब से अपने  मन  को,
पत्तों  का  लहराना था या
मन  के   आलोड़न   को!
       किसी तरुणी की आँखें  ज्यों
       मान  छुपा   कर    मूँदें!
       बोझिल  हुआ सावन पहले,
       फिर  झरने  लग  गईं बूँदें!
एक बार  बूँदों  से ज्यों ही
छूटा   सब्र   का   दामन,
हल्के से छुआ हो  जैसे-
भीग  गया  उसका मन.
     होंठों पर कुछ शिकवे लाके 
     धीरे  से  यों  बोली –
     “सालों  से तुम भरमाए थे,
      मन  की   गाँठ न खोली!
ये सुरम्य आकाश,न देखा-
पत्तों   की  यह   सिहरन.
सोंधी  सी  मीठी  ख़ुशबू में
भीगा कहाँ  थका   मन?

    झरती  बूँदों  के गीतों  ने
    सींचा  सुर   में  तुमको?
    क्षितिज  में  छाए इन्द्रधनु ने
    वापस  खींचा  तुमको ?”
उमड़-उमड़  कर बूँदों ने,
जब मन  को दिया टहोका,
प्रेमी  के  मनुहारों  सा 
जाते  क़दमों  को रोका!

    बूँदों के आरोह-अवरोह में ,
    घुल  गई  सावनी  रातें!
    धड़कन  के ठेकों के संग में
    मन – मल्हार  की  बातें!

वीणा सिंह 


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