महकमे के आक़ा को नींद कब मयस्सर हो,
सुकून कहाँ मिले जब ताज कोई सर पर हो!
कभी तनहाई, कभी साज़िश,सिलसिला-ए-रवायत है
ग़म-ए-दौराँ बस पीर और ख़ुदा की रहमत है।
मुंसिफ़मिज़ाजों को काम भला क्यों कम हो!
महसूल हज़ारों से लिए अपनी बारी पेचोख़म क्यों।
नींद की सिलवटों में ग़ाफ़िल कोई जज़्बा होगा
इन्हीं रतजगों में फ़लसफ़ा बनके बयाँ होगा।
बहुत लिखी दिखी इबारत दीवारों के रोगन में
बनके रोशनज़मीर नूर भर दो रोज़े रौशन में।
बेअमल अर्ज़ियों की क़िस्मत का कुछ अंजाम हो जाए
ग़ालिबन सर्दियों तक होरी का भी काम हो जाए।
गर्दनफ़राज़ नहीं ग़रीबनवाज़ हैं — सबसे कहते हैं
हम रास्ता तकते नहीं हैं, साथ-साथ चलते हैं।
वीणा सिंह
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