Thursday, November 12, 2020

ज़िन्दगी

 


ले रहा हो छंद जब  आकार कोई मन में

इंद्रधनुषी सपनों का हास लगे ज़िंदगी। 

 

राह बाट पंकिल हो बोझ थोड़ा मुश्किल हो 

नेह ज़रा मिल जाए तो आस लगे ज़िंदगी ।

 

सुख- दुख की बात हो, कुछ मुक्त अट्टहास हो 

अपनों के घेरे में आकाश लगे ज़िंदगी ।

 

चीन्हे हाथों का जब पहरा हो सपनों पर 

छटपटाती मीन की साँस लगे ज़िंदगी ।

 

सब कुछ पुराना है – रटते  हैं रात दिन 

जाने कब हो  ऐसा,  ख़ास लगे ज़िंदगी ।

 

पहचानी आहट हो जब चेतना के दरवाज़े 

कभी -कभी बेले का उजास लगे ज़िंदगी ।

 

अल्बम पुरानी हुई, फिर भी देखें ज़रा 

यहीं कहीं शायद आस -पास लगे ज़िंदगी ।

 

 

वीणा सिंह                  

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