ले रहा हो छंद जब आकार कोई मन में
इंद्रधनुषी सपनों का हास लगे ज़िंदगी।
राह बाट पंकिल हो बोझ थोड़ा मुश्किल हो
नेह ज़रा मिल जाए तो आस लगे ज़िंदगी ।
सुख- दुख की बात हो, कुछ मुक्त अट्टहास हो
अपनों के घेरे में आकाश लगे ज़िंदगी ।
चीन्हे हाथों का जब पहरा हो सपनों पर
छटपटाती मीन की साँस लगे ज़िंदगी ।
सब कुछ पुराना है – रटते हैं रात दिन
जाने कब हो ऐसा, ख़ास लगे ज़िंदगी ।
पहचानी आहट हो जब चेतना के दरवाज़े
कभी -कभी बेले का उजास लगे ज़िंदगी ।
अल्बम पुरानी हुई, फिर भी देखें ज़रा
यहीं कहीं शायद आस -पास लगे ज़िंदगी ।
वीणा सिंह
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