चुरा के लाए हैं दो -एक साँस
बेसब्र ज़िंदगी की बस्ती से
सुकून की एक नदी को पार करें
आज इसी पुरानी कश्ती से।
वक़्त के सबसे नीचे ख़ाने में
एक चादर वहाँ पड़ी होगी
आज हम उसको ही बिछाएँगे
बेल-बूटों से वह जड़ी होगी।
उन तारों ने सहेज रखे हैं
न जाने कितने कहकहे अपने
जिन्हें तुम फूल-पत्ती कहते थे
वे ही रेशमी पल रहे अपने।
दरम्यान उन रेशमी तारों के
तुमने एक लाल बूटा देखा है
बड़ी लंबी वह राजदारी है
बड़ी मुश्किलों का लेखा है।
सब ने अपनी तरफ़ से कोशिश की
हर तार, तार-तार करने की
हमने ताक़त बचाके रखी है
हर बूटे में प्यार करने की।
न जाने कितनी कोशिशों से हमने
बचा रखी है कोशिशें अपनी
कैसी सर्द हवा के झोकों में
छुपा रखी है आतिशें अपनी।
आज सब काम काज रहे बाक़ी
सहेजें उन सलवटों को पहले
वक़्त की चोट से जो अनछुई
वक़्त की उन करवटों को पहले।
वीणा सिंह
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