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Saturday, January 17, 2026

स्वप्न राग

 


स्निग्धता का मलय वात है,

पिघले कुंकुम में रंगा प्रात है,

हरित राशि ऋतु साथ-साथ है,

नव उन्मीलित जलजात है।


शाख पर खिल रहे मंजर हैं,

इन सपनों के नूतन स्वर हैं।


अनन्त में कोई अग्निकण हो

पराग का पीताभ वन हो,

इन्द्रधनु में स्नात वन हो

लाल युवा ऊर्जस्वित तन हो।


दिग-दिगन्त पर अग्नि लेख

चित्रित करते इनके कर हैं।


तरल अगन सा मध्याह्न में

पट परिवर्तन हो आंगन में

जाल बिछा अहेरी क्षण में

शर-संधान करे निर्जन में।


निशि-याम क्रन्दन रोदन है

भयभीत वाण हत जर्जर हैं।


निमिष मात्र मन के प्रांगण में

रक्त स्नात टूटे दर्पण में,

सहस्र बिम्बों के कम्पन में 

शेष कथा बाँचे जीवन में ।


हों धराशेष हों मुक्तप्राण

फिर भी चंचल उनके पर हैं


हुलसित प्राची का स्वर किंकण 

दुर्द्धर्ष वात चंडी नर्तन 

क्लान्त दिवस प्रत्यावर्तन 

राग राग का अनुरणन ।


शाख पर खिल रहे मंजर हैं,

इन सपनों के नूतन स्वर हैं ।


वीणा सिंह