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Monday, January 19, 2026

चिट्ठी

 बड़ी क़ीमती होती है—

दराज़ों के कोनों में,

अलमारियों के तहख़ानों में 

कई वर्षों से 

व्यर्थ करार दी गई 

ऊल-जलूल

काग़ज़ात के पन्नों से 

झांकती, सर उठाती—

एक मासूम चिट्ठी ।

विगत की दरारों से झाँकती 

साथ लिए आती है

अनगिनत लम्हों की थाती 

अपने नामालूम अस्तित्व का

एहसास दिलाती।

अनगिनत वर्षों से

किसी रोशन वातायन को तरसती

पीले, दाग़दार,

कुतरे पन्नों में तब्दील 

अचानक एक अंकुर सा

पनप आती है—

अब भी आश्वासन देती है

कोमल एहसासों का, 

सुदीर्घ सहअस्तित्व का।

अपरिचय की सीमा से परे,

सहजता की पगडंडी पकड़े 

यही विश्वास 

मन के एकांत 

अछूते कोनों को करता है

निर्भीक रूप से अनावृत ।


वीणा सिंह