Saturday, January 14, 2012

आदमी और जानवर की कहानी

सुरसुरी चुहिया ने धीरे से बाउँडरी वाल से झाँका तो उसे दो आदमियों के जोर-जोर से लड़ने की आवाज सुनाई दी ।तेज-तेज आवाज में बोलते-बोलते एक का गुस्सा इतना बढ़ गया कि वह जोर से चिल्लाया-जानवर कहीं के!
सुरसुरी अंदर ही अंदर गुस्से से पागल हो गई- इतनी हिम्मत !इतनी बेइज्जती! यह बात तो सबको बतानी ही होगी ।आखिर इससे शर्मनाक बात तो हो ही नहीं सकती कि कोई आदमी जानवरों को "जानवर "कह के पुकारे!आखिर कुत्तों और घोड़ों के भी नाम होते हैं- Tommy, Turbo, Volto, Booster, Hardy,Sturdy,Brandy........और जाने क्या-क्या!पर कोई उन्हें "जानवर" कह के तो नहीं पुकारता ।
गुस्से से उफनती हुई वह बाउंड्री वाल से उतरी और  थोड़ी दूर पर अंदर ही अंदर बनी सुरंग से होती हुई जंगल में पहुँची।शुक्र है,अभी तक इस गुप्त रास्ते के बारे में कोई नहीं जानता।कहीं पता लग जाये तो मेरी शामत आई समझो!
जंगल और शहर पास-पास तो थे,लेकिन कुछ दिनों से दोनों के बीच एक लकीर खिंच गई थी।  इधर आदमी ज्यादा से ज्यादा अमीर  होता गया, साथ ही घमंडी भी। जानवरों को भी लगा कि पहले जैसी इज्जत उन्हें आदमी देता था, अब वैसा नहीं रहा।
इस तरह पास की नदी की दोनों ओर का हिस्सा बँट गया। एक तरफ शहर और दूसरी तरफ जंगल ।

शेरा शेर ने सबसे कह दिया कि अब सिर्फ खा-पीकर, आँखें मिचमिचा कर लँबी तानना उचित नहीं। अब वह सलमान Bodyguard  बनकर दिखाएगा। उसकी एक दहाड़ से आदमी पिद्दी बन जायेगा। लम्बू जिराफ उसकी मदद को आगे आया।अपनी लम्बी गर्दन उठा वह दूर-दूर तक देख कर बता सकता था कि दुश्मन कहाँ है। जम्बो हाथी सबसे दुखी था। अब तक शहर के मंदिरमें गणपति बप्पा के चरणों में बैठकर वह उन्हें शत-शत नमस्कार करता। आजकल नदी के जल में घुसकर घंटों उन्हीं दिनों के बारे में सोचना ही उसका टाइमपास था।
मि.और मिसेज.बुल अपने परिवार में व्यस्त थे। पहले देश-विदेश में उनका नाम था। व्हाइ दिस कोलावरी -गाने में तो उन्हें होली काउ कह कर सम्मान दिया गया था।

कालू भालू चिड़ियाघर से छूट आया था-ऐसे भी वहाँ वह उदास रहता था। दिन भर शहरी बच्चे उसे पत्थर मारते,यहाँ आकर उसे शाँति मिली।
सुन्दर बंदर को शहर में fridge से फल निकाल कर खाने की आदत पड़ गई थी। यहाँ आकर वह डालों पर झूलता, कलाबाजियाँ दिखाता और ताजे फलों का नाश्ता करता।
बादलों के घिरते ही सतरंगी मोरनी अपने पंखों को फैलाये नाचती तो रंग-बिरंगे पंछी जुट जाते-इंद्रधनुष का पर्दा तन जाता, तरह-तरह की मीठी तान
सुनाते पक्षी ऐसी औरकेस्ट्रा बजाते कि बस जंगल में मंगल हो जाता।
एक दिन सुरसुरी शहर से खबर लाई कि दिवारों पर पोस्टर चिपके हैं और कोई मेजिनी सर्कस के आने की धूमधाम है। इसमें केवल आदमी काम करेंगे,
कालू, लम्बू, जम्बो, सुंदर......किसी को नहीं बुलाया जायेगा।ऊँची तार पर चलने वाला भी आदमी, बच्चों की साइकिल चलाने वाला भी आदमी, चारों ओर आदमी ही आदमी!

थोड़ीदेर को सन्नाटा छा गया। पिछली बार का सर्कस इतना बढ़िया था कि क्या कहें? बच्चे तो रोज भागे चले आते। अब क्या होगा!

मेजिनी सर्कस आया भी, लगा भी और कुछ दिन चला भी लेकिन लोगों को बड़ी निराशा हुई -अगर आदमी ही साइकिल चलाये तो नया क्या है!रास्ते पर भी यही रोज दिखता है-मजा तो तब है,जब सुंदर सीटियाँ मारे, कालू प्लेटें उछाले, जम्बो बड़ी सी गेंद पर बैठ कर लुढ़के! बच्चों का चेहरा लटक गया, सर्कस पूरी तरह फ्लाप हो गया।
धीरे-धीरे आदमी की समझ में आ गया कि जंगल के उस पार के प्राणी उनसे बेहतर, बुद्धिमान और सभ्य हैं।वे उन्हें बहुत मिस कर रहे थे-सुबह उठते ही कोयल की कूक ,इग्रेट की gurgle sound..........जाने कहाँ खो गये थे!
पता नहीं, दोनों का झगड़ा कब खतम होगा! जिस दिन ऐसा हो जाये, लंबू, शेरा कालू, सुंदर के चेहरे उदास नहीं होंगे। उनकी आँखों में आँसू नहीं होंगे। शायद किसी दिन आदमी को अक्ल आ जाये!

वीणा सिंह

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