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Monday, November 9, 2020

कोहरा

 

भिनसारे-भिनसारे शायद बूँद पड़ी है।

दुनिया अब तक सोई, आँखें मूँद पड़ी है।

कुहरे की चादर में सिमटी अलसाई सी

ऊँघ रही है सपनों में जागी सोई सी।

 

गलियारे की चौखट से कई बार पुकारा 

खिड़की की झिरी से झाँक-झाँक कर हारा

एक चाय को तरस गया गठिया का मारा

घंटों से अधलेटा था, सूरज बेचारा।

 

अन्त में चिढ़ कर उसने जो लाठी फटकारी

हलचल मची कुहरे से निकली दुनिया सारी

शर्मायी- सकुचाई, चौका -बरतन सँभाला,

कहा बुद्धि पर जाने कैसे पड़ गया पाला।

 

वीणा सिंह