Monday, March 9, 2026

बोनसाई

 बगीचे के कोने में

या ड्राइंग रूम की मेज़ पर

तुम सब ने सजाये हैं

अपने अपने बोनसाई 


मिट्टी और खाद थोड़ी 

जीने को आकाश थोड़ा 

नमी और उजास थोड़ी 

हवा और वातास थोड़ा 


काल की फैली हुई 

बाँहों को काट कर

आकाश को छूती हुई 

टहनियाँ छाँट कर 


तारों से गुँथीं-कसी

सुनिश्चित राह हो,

हमारी हर ग्रन्थि में

तुम्हारी ही चाह हो ।


नपा तुला आकाश हो

नपी तुली सृष्टि हो

हमारे संवर्धन में

तुम्हारी ही तुष्टि हो।


“विरूप है पर ख़ास है

नयेपन का वास है।

इसकी हर ऐंठन में

कला का आभास है।”


प्रशंसित , अभ्यर्थित

अपने गर्व में गर्वित 

तुम सब ने गढ़े हैं

हम जैसे अनेक नन्हें बोनसाई ।


वीणा सिंह 


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