बगीचे के कोने में
या ड्राइंग रूम की मेज़ पर
तुम सब ने सजाये हैं
अपने अपने बोनसाई
मिट्टी और खाद थोड़ी
जीने को आकाश थोड़ा
नमी और उजास थोड़ी
हवा और वातास थोड़ा
काल की फैली हुई
बाँहों को काट कर
आकाश को छूती हुई
टहनियाँ छाँट कर
तारों से गुँथीं-कसी
सुनिश्चित राह हो,
हमारी हर ग्रन्थि में
तुम्हारी ही चाह हो ।
नपा तुला आकाश हो
नपी तुली सृष्टि हो
हमारे संवर्धन में
तुम्हारी ही तुष्टि हो।
“विरूप है पर ख़ास है
नयेपन का वास है।
इसकी हर ऐंठन में
कला का आभास है।”
प्रशंसित , अभ्यर्थित
अपने गर्व में गर्वित
तुम सब ने गढ़े हैं
हम जैसे अनेक नन्हें बोनसाई ।
वीणा सिंह
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