Thursday, February 26, 2026

कच्चे पक्के सपने


 

अँधियारे के तटबंध पर

बैठा एक अकेला 

एकाकी आकाश के नीचे 

देखता संध्या बेला

 

घाट किनारे सूनापन था

मन मानस बिखरा था

ख़ुश्क ज़मीन भले चुभती हो

ऊपर आकाश निखरा था

 

हाट-हाट में घूमती फिरती

घाट आ लगी नौका

मन की दीवारों ने लेकिन 

उड़ते सपनों को टोका

 

कच्चे पक्के लदे थे सपने

जीवन की दोपहर में 

खेल-खिलौने औने पौने

ऊब-डूब लहर में

 

तोल मोल के देख रहा था

बीत गये हर पल को

पल में तोला पल में माशा

डूबते जी बेकल को

 

उत्तुंग तरंग सी आह्लादित थी

अब तक लहरों की आशा 

आज न जाने कैसे पल में 

बँध गयी एक निराशा 

 

जीर्ण बिसात पर रोज़ सजा के

 तोलता दिन का मोती

अँधियारे दुर्गम राहों में

ढूँढ़ता मन की ज्योति 

 

निश-दिन अब तक यही रहा था

सुबह शाम का खेला

व्यस्त भावों से रोज़ सजाता

नूतन भावों का मेला

 

आज न जाने कैसे पल में

बिखर गये वे सपने

प्रश्न पूछने लगे हजारों

नितान्त भाव जो अपने

 

धीरे-धीरे एक कालिमा

रंगने लगी गगन को

बची-खुची स्याही की बूँदें 

बोझिल कर गयी मन को।


वीणा सिंह 

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