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Thursday, November 12, 2020

कुछ यूँ शुबहा होता है

 कुछ यूँ शुबहा होता है 

ज़िंदगी गुस्ताख़ हुई जाती है 

कोई रुका रहे उसकी जानिब

अपनी रौ में बही जाती है 

 

किनारे धूप में बैठे रहो 

एक क़तरा मयस्सर ही नहीं 

दर्द का  एक झरता चश्मा है 

जैसे उसपे कोई असर ही नहीं 

 

अधखिली धूप है खिले न खिले 

रेत है हाथों से छूट जाती है 

किसी जवाब की उम्मीद नहीं 

बढ़ती लड़की से निकल जाती है    

 

वीणा सिंह 

एक अरसा हुआ ख़ुद से मिले

 एक अरसा हुआ ख़ुद से मिले 

किसी तन्हाई में ठहरे -बैठे

हर घड़ी एक ख़याल आता है 

ज़िंदगी का सवाल आता है

 

ये परिंदे दरख़्त फूल- पत्ते 

सब उड़ते हुए से  रंग -धब्बे

बारहा सोचा है रफ़्तार कम कर लें 

किसी क़िस्से पर आँख नम कर लें

 

एक चौखट में क़ैद है तब से 

एक गूँगा सा वक़्त जाने कब से 

उसे भी आसमाँ दे, वह  पर तोले 

गुनगुनी रात में वह भी बोले 

 

यह रात दिन जो है तराशा हुआ 

पीला ज़र्द वक़्त कि है नपा -तुला 

खिड़कियाँ खोल दें  कि आसमाँ निकले 

कि आसमाँ के पार का समाँ निकले