Saturday, September 29, 2018

घर

नील पहाड़ियों के पीछे से
रोज़ सुबह कोई शंखध्वनि
गूंज उठती है,
हृदय की शिराओं को छूती है,
देती है आमन्त्रण।
वर्षों पहले उस घर से आते हुए
आँखों में ठिठके अश्रु-भार,
और पाषाण भरे हृदय के
बोझ को सँभाले——
आँचल के लावे 
आँगन में पूरे फेंके नहीं गये,
उनमें से कुछ
लाल साड़ी की खूँट बँध,
चुपचाप चले आये हैं,
इस घर तक——-
हज़ारों योजन की दूरी लाँघ।
वे ही ले जाते हैं, जब-तब
किसी अधूरे अनुष्ठान की पूर्ति को—
एक नई परिक्रमा के लिए
एक बूढ़े बरगद सा यह घर
प्रतीक्षा में बैठा है,
परिचित क़दमों की आहट,
उसकी धड़कनें वासंती कर देती है
वह अपना कलेवर 
बदल लेता है-
अपनी उम्र भूल
चहकने लगता है।



वीणा सिंह


जिन और सी एल



कल जाने क्या बात हो गयी
आधी-आधी रात हो गयी

बहुत रात को जिन जब आया
अपनी थैली बिन वह आया

सब कुछ पहले सही हुआ था
ऐसा पहले नहीं हुआ था

चाँद-सितारों के उस घर से
आसमान से दूर शहर से

जाने क्या-क्या ले आता था
मुझको सपने दे जाता था

चाँद सितारों की वह दुनिया
आइसक्रीम चाकलेट की दुनिया

लाता था वहाँ से थोड़ी 
सपनों में वह चाट पकौड़ी 

फूल पहाड़ नदी और झरने
उन सपनों के थे क्या कहने

आते ही थका सा बोला
(चलो कम से कम मुँह तो खोला)
सबको अपनी अपनी पड़ी है
मेरी मुश्किल बहुत पड़ी है

इसको दे दूँ उसको दे दूँ
आख़िर किसको किसको दे दूँ

मुझको भी दो छुट्टी भाई
नहीं तो तुमसे कुट्टी भाई

न कोई सी एल न कोई ई एल
खटता रहता हूँ मैं हर पल

मुझको भी तुम लिफ़्ट करा दो
थोड़ी सी तुम लिफ़्ट करा दो

सिक लीव की यह अर्ज़ी है
आज तो मेरी भी मर्ज़ी है

हाथ में देकर चला गया वह
पल भर में बस धुआँ हुआ वह


वीणा सिंह




हरकारा


उस दिन जैसे एक हरकारा
भरी दुपहरी आया हो
भूले भटके बिन आहट के
पाती मेरी लाया हो

किसी दुर्ग के अभ्यंतर में 
जलते-बुझते दीप सी
व्यग्र गरजते सागर तट पर 
पड़ी हुई एक सीप सी

मलय गंध में बहती-तिरती
अबूझ नेह लिपटी फिरती
कथा अदेखी किस दुनिया की
कानों में कहती -फिरती

सघन व्यस्त जंजाल भरे दिन
उलझन कितनी रातों की
अनियारे बेचैन स्वप्न सी
क़िस्से ब्यौरे बातों की

किन राहों में घूमी-भटकी
अनजान यायावर थी
कई ऋतुओं की गंध लिए
बैठी देहरी थककर थी

धूसर मलिन वस्त्र पड़े थे
विगत दिनों के हस्ताक्षर
कटु तिक्त मधुरिम पल वाली
कथा-व्यथा अंकित मिलकर

बस उन छोटे मौन पलों में
चित्र-पटी सी चल निकली
मन के आँगन बँधी रही थी
राह ढूँढती निकल चली

अवगुंठन की डोर बँधी जो
शिथिल भाव से काँधे से
आकाश-कुसुम सी झर निकली
रोके न रुकी फिर बाँधे से

वीणा सिंह