Saturday, September 29, 2018

घर

नील पहाड़ियों के पीछे से
रोज़ सुबह कोई शंखध्वनि
गूंज उठती है,
हृदय की शिराओं को छूती है,
देती है आमन्त्रण।
वर्षों पहले उस घर से आते हुए
आँखों में ठिठके अश्रु-भार,
और पाषाण भरे हृदय के
बोझ को सँभाले——
आँचल के लावे 
आँगन में पूरे फेंके नहीं गये,
उनमें से कुछ
लाल साड़ी की खूँट बँध,
चुपचाप चले आये हैं,
इस घर तक——-
हज़ारों योजन की दूरी लाँघ।
वे ही ले जाते हैं, जब-तब
किसी अधूरे अनुष्ठान की पूर्ति को—
एक नई परिक्रमा के लिए
एक बूढ़े बरगद सा यह घर
प्रतीक्षा में बैठा है,
परिचित क़दमों की आहट,
उसकी धड़कनें वासंती कर देती है
वह अपना कलेवर 
बदल लेता है-
अपनी उम्र भूल
चहकने लगता है।



वीणा सिंह


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