Monday, October 22, 2018

एक वृत्त सरीखी दुनिया है तुम्हारी

एक वृत्त सरीखी दुनिया है तुम्हारी
जिसके केन्द्र में तुम हो—- केवल तुम
अनाम, अरूप, अव्यक्त 
कुछ अनासक्त भी-
ऐसे हो , मानो नहीं हो
न्याय करते हो, पर दया भी
दण्ड देते हो, पर क्षमा भी
प्यार तो बेइंतिहा है
पर भृकुटि भी तनी रहती है
सबसे अलग, सर्वशक्तिमान!
लेकिन कभी 
गाँव में छूटी बूढ़ी माँ की तरह
और दमे से जर्जर पिता की तरह
प्रतीक्षारत 
कि सुध लूंगा तुम्हारी
हे पिता! परमपिता!
परिधि पर चक्कर काटता मैं
जानता नहीं कि 
एक अदेखी डोर से 
तुमसे ही बँधा हूँ-
पतंग उड़ाते बच्चे की तरह
तुमने ढील दे रखी है
और मैं सोचता हूँ
मैं अपनी ही ऊर्जा से 
ऊपर और ऊपर और ऊपर
उड़ सकता हूँ।

राजीव

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