Tuesday, May 30, 2017

गुलमोहर



बंध्या बन आकाश झुका है
अवरुद्ध वातास  रुका  है
मन  की धरती की सुरंग में
बेकल सा एक  श्वास रुका है!

शरतचंद्र की  मानिनी धरती
अपने  आँगन में सिमटी  है
रोदन और उच्छवास  की चादर
में  जाने  कब से  लिपटी  है!

नीर रहित  हैं  दोनों  प्याले
घर  के जैसे  ख़ाली  आले
काया की  कथरी को  भींचे
क्षुधा – अग्नि  को कबसे पाले!

सृष्टि की उत्तप्त साँस  की
लड़ियों को गिनती रहती है
पाखी  के यायावर स्वर  के
संग-संग  फिरती  रहती  है!

चलते-चलते  ठिठका मौसम
ज्वाल प्रवाल के दान दे डाले
धरती  की  मुस्कान नहीं यह,
जैसे  होंठों  के  हों   छालें!
                        
 वीणा सिंह



बादल और लहरें


(रवीन्द्रनाथ ठाकुर की कविता पर आधारित)


माँ,बादल में रहने वाले हरदम मुझसे कहते हैं
“भोर भये से शाम गये तक,हम सब खेला करते हैं
कभी हमारे खेलों में होती है  भोर  सुनहली
कभी संग -संग खेला करती चाँद की जोत रुपहली”
उनकी बातें सुन-सुन कर मैं उनसे पूछा करता हूँ-
“तुम सब की दुनिया में कैसे आऊँ,सोचा करता हूँ!”
वे कहते हैं-“जब भी तुम धरती के छोर पर आओगे
आसमाँ में हाथ उठाओ, बादल पर आ  जाओगे !”
मैं कहता हूँ-“माँ घर बैठी, राह निहारा करती है-
कब जल्दी से घर आ जाऊँ, बैठी सोचा करती है!”
सुनकर मेरी बात वे बस हल्के से मुस्काते हैं,
फिर धीरे-धीरे आकाश में प्लावित हो बह जाते हैं।
पर इन सबसे सुन्दर क्रीड़ा, माँ मैं तुम्हें बताता हूँ!
तुम बन जाओ चाँद गगन का,मैं बादल बन जाता हूँ!
तुमको दोनों हाथों से मैं, ढँक लूँगा बादल बन के,
घर की छत फिर निखर उठेगी, सुन्दर नील गगन बनके

सागर की लहरों के वासी हरदम मुझे बुलाते हैं-
कहते हैं –“हम सुबह से लेकर रात गए तक गाते हैं-
इसी तरह से रोज़ निरंतर यहाँ वहाँ भ्रमण करते,
यों ही गाते-गाते ,जाने कहाँ-कहाँ विचरण करते!”
मैं पूछा करता हूँ उनसे-“कैसे तुम संग आ जाऊँ?”
वे कहते हैं –“तट पर आके उनके रंग में रंग जाऊँ!
मूँद के अपनी आँखें पल भर सागर तट पर रह जाऊँ,
लहरों की बाँहों में बँध के उन तक मैं फिर बह आऊँ”
मैं कहता हूँ-“बात बात में मुझे पुकारा करती है,
माँ को छोड़ के कैसे आऊँ ,बस मुझे निहारा करती है”
मेरी बातें सुनकर वे फिर धीरे से मुस्काते हैं-
नर्तन  करते करते आँखों से ओझल हो जाते हैं.
लेकिन मुझको माँ आता है, इससे भी अच्छा खेला!
तुम बन जाओ सागर का तट,और मैं लहरों का मेला-
इसी तरह से गोल-गोल लहरों सा चलते-चलते
टूट बिखर जाऊँगा तेरी गोदी में खिलखिल हँसते!
फिर हम दोनों लुकाछिपी खेल मगन हो जायेंगे,
लोगों की नज़रों से ओझल हम दोनों हो जायेंगे!!!

वीणा सिंह


Friday, May 26, 2017

झारखंड का बिरवा



झारखंड  का नन्हा  बिरवा
सागर  तट   पर   आया,
देख  के झिलमिल जल की लहरें
मन मृग  था  भरमाया

ऊपर  नील आकाश झुका
नीचे पारे  का  दर्पण
मुग्ध ज्योत्सना बिछी हुई
सब कुछ करने को अर्पण

संझा का  वह  नील  रंग
नीम  आलोक का  जादू
किसी रहस्य के नीचे ठिठका
बिरवा  हुआ   बेक़ाबू!

उच्छल जल की कलकल लहरी
बेकल  करती  मन  को
जैसे तान तरंगित कर दे
रहस्य घिरे प्रांगण  को

वर्षों की कोई  आशा  भूली
या  एक  पल  की  माया
बिरवा  चला उस पल को थामे
बस  डूबा – उतराया  !

दूर-दूर  तक स्निग्ध नमी थी
बस  कोई  छोर  नहीं  था
मन को  लेकिन बाँध  सके
ऐसा भी  ज़ोर नहीं  था

शीतल जल की कोमल लहरी
दूर निकल  वह   आया
जब देखी  नभ की परछाईं
हृदय  विकल  हो  आया



कहाँ गई वह  मोहिनी  माया
नीलम नभ  की छाया
अंधकार  के पाश  बँधी
धवल  चाँद  की  काया

पट- परिवर्तन के होते ही
मिथ्या  से  बाहर  आया
निर्जन मंच पर ख़ुद को देखा
हृदय  बड़ा  घबराया!

स्निग्ध लहर  का आकर्षण  था
नित नवीन  का  सुख  था
लेकिन  मिट्टी  यहाँ  कहाँ
बस इसी  बात  का  दुख था।

चारों  ओर  रेती  ही  रेती
बाँध  सके न  तन  को
उलझ जाए  पाँवों में लेकिन
जकड़ सके  न  मन  को

कलकल  बहते  जल  के नीचे
धरती यहाँ  कहाँ  थी?
तन भीगा, पर  मन था भारी
यह कोई  और  जगह थी!

मिट्टी  के  आँगन  में  पनपा
मिट्टी का था  जाया
सागर  तट  पर  मिट्टी छूटी
जल में  घुल  गई  काया!

वीणा सिंह

Thursday, May 25, 2017

स्नेह-पाश



आज भीड़ को परे हटा कर
हल्के क़दमों  कोई साया
धीमे से मेरी छिगुनी थामे
निर्भृत कोने  में    आया

हल्की उस एक छुअन में
दबी   थी  कितनी  बातें
अँगड़ाई लेते अतीत  में
ग्रीष्म,  शिशिर, बरसातें

नन्हें-नन्हें  स्मृति खंड वे
चंचल  पग   से    भागे
मेरे विह्वल मोह पर हँस दें
निकले   मुझसे   आगे

कुछ स्मृतियाँ थीं अट्टहास की
प्रेम- स्निग्ध  नयनों  की
कुछ खिलखिल गोपन  बातें
कुछ व्यंग्य -बोल ,बैनों  की

तपती जेठ की भरी दोपहरी
ओझल  हो  कोई  कोना
निश्वास गगन के संग -संग
अबूझ  था  मन  का रोना

बरसाती ,सोंधी ख़ुशबू  और
श्रावणी   मेघ   मल्हारें
पेंगें  भर आकाश को छू लें
मुक्ता -  मणि  उतारें

आज  कहाँ से विस्मृत घड़ियाँ
नर्तन   कर  लहराईं?
एक स्पर्श से  हृदय बाँध
कुहेल धूम्र  सी  छाईं  !

कितने  वादे , कितनी बातें
सच थे  या  थे सपने?
मन-आँगन के मंच पर सारे
सज गये  कितने  अपने!

खींच चले जब स्नेह-पाश में
मन स्वंय हुआ निरुत्तर
विकल ,विरागी मन ने पाया
शाश्वत  प्रश्न  का उत्तर

जीवन की उधेड़-बुन में
सालों  रहा  अकिंचन
आज अचानक सरस कर गया
स्निग्ध पाश  का  बन्धन!

वीणा सिंह