Tuesday, May 30, 2017

गुलमोहर



बंध्या बन आकाश झुका है
अवरुद्ध वातास  रुका  है
मन  की धरती की सुरंग में
बेकल सा एक  श्वास रुका है!

शरतचंद्र की  मानिनी धरती
अपने  आँगन में सिमटी  है
रोदन और उच्छवास  की चादर
में  जाने  कब से  लिपटी  है!

नीर रहित  हैं  दोनों  प्याले
घर  के जैसे  ख़ाली  आले
काया की  कथरी को  भींचे
क्षुधा – अग्नि  को कबसे पाले!

सृष्टि की उत्तप्त साँस  की
लड़ियों को गिनती रहती है
पाखी  के यायावर स्वर  के
संग-संग  फिरती  रहती  है!

चलते-चलते  ठिठका मौसम
ज्वाल प्रवाल के दान दे डाले
धरती  की  मुस्कान नहीं यह,
जैसे  होंठों  के  हों   छालें!
                        
 वीणा सिंह



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