Friday, June 30, 2017

शौक़



कद्रदाँ अब भी खड़े हैं तुम्हारी ताजपोशी के लिए
खुदा के बाग़ से तुमको गुल लाने का बहुत शौक़ है
बहुत रातें गुज़ारीं कमखाब और मख़मल के बिस्तर पर
कोई क्या करे सूली पर जिसे ख़्वाब आने का शौक़  है
यों तो जगमगाती रात भी  है, चाँद भी ,तारे भी हैं
छाले पड़े पाँवों से चल  बस  उतारने का शौक़ है!
इन  रास्तों पर भीड़ के क़दमों  की मुहर लग चुकी
हमारे क़दमों को नए  रास्ते आज़माने का  शौक़ है!

वीणा सिंह

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