कद्रदाँ अब भी खड़े हैं तुम्हारी ताजपोशी के लिए
खुदा के बाग़ से तुमको गुल लाने का बहुत शौक़ है
बहुत रातें गुज़ारीं कमखाब और मख़मल के बिस्तर पर
कोई क्या करे सूली पर जिसे ख़्वाब आने का शौक़ है
यों तो जगमगाती रात भी है, चाँद भी ,तारे भी हैं
छाले पड़े पाँवों से चल बस उतारने का शौक़ है!
इन रास्तों पर भीड़ के क़दमों की मुहर लग चुकी
हमारे क़दमों को नए रास्ते आज़माने का शौक़ है!
वीणा सिंह
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