Saturday, January 21, 2012

चिल्लर-प्रसंग

मेरे घर में सिक्के कहीं भी फैले रहते-कहीं भी माने कहीं भी-तकिए के नीचे, पलंग के नीचे,टेबल के ऊपर, टी.वी.के पास, गंदे कपड़ों के ढेर में, पैंट की जेब में, और तो और कभी -कभी वाशिंग मशीन से धुल कर नए-नए चमचमाते निकल आते। सिक्के घर से बाहर जाते नहीं थे, बाहर से घर में आने की प्रकिया जरूर जारी रहती। कंजूस के धन की तरह लोग उन्हें समेटने में लगे रहते, हालाँकि इसमें वणिकों की साधना कम, आलस्य की भावना अधिक होती। जहाँ जीवन में मनुष्य की पीठ पर निरंतर दैनिक जीवन का बोझ बढ़ता चला जाता है, वहाँ मनुष्य भी गर्दभ की तरह कंधे उचकाकर, दुलत्ती मारकर अपने बोझ की थोड़ी-बहुत मिट्टी झाड़ने से बाज नहीं आता।
इसके अलावा बाजार के छोटे-बड़े, अच्छे-बुरे तत्वों से मन ही मन प्रतियोगिता भी चलती रहती है - भई! देना है तो तुम दो, मैं क्यों दूँ? - इस तरह न कहकर, मन ही मन इस भाव को दबाकर, हर दुकानदार को थोड़ी देर चेंज के लिये परेशान देख खुद खुश होने की चालाकी उसे थोड़ी देर के लिये ही सही जीत की खुशी तो दिला ही देती है। वह एक मिनट उस आदमी का होता है, जो सिक्का मुट्ठी में दबाये तो हुए है, पर उस हैरान-परेशान दूसरे आदमी को देना नहीं चाहता। जाने कब की, इस जनम की या पिछले जनम की दुश्मनी यहाँ कारगर हो जाती है। इस नाटकीय परिस्थिति में मजबूत पार्टी के मन में अनेक रचनात्मक  संवाद जन्म ही नहीं लेते, अस्त्र-शस्त्र बनके हवा में लहराने लगते हैं, जैसे-"अब घूमो बच्चू, दो रुपये के चेंज के लिये गली-गली!"  अथवा "खबरदार, जो दो रुपये के बदले मुझे टॉफी पकड़ाई!'अथवा " अब आया ऊँट पहाड़ के नीचे...."  जाहिराना तौर पर प्रतिक्रिया कुछ भी हो सकती है जैसे - सिक्के का चोर सामान काऊँटर पर पटककर उसे वापस कर देने का नाटक करे या सामने वाले के चेहरे की बेचारगी का मन ही मन आनंद ले या इस रस्साकशी में कुछ रुपयों की रियायत पा जाये या अगर दूसरा पक्ष कोई टैक्सी या रिक्शा वाला हो तो
उससे हाथापाई होने की संभावना के बावजूद अपनी जगह पर अड़ा रहे कि उसके पास एक नया पैसा भी चेंज नहीं।
 इस तरह की परिस्थितियों की द्वंद्व प्रतियोगिता में जीतते चले जाने की प्रक्रिया के फलस्वरूप ही हमारे घर में सिक्कों का पहाड़ जमा होता चला गया और सही जगह पर ठौर न मिलने के कारण सरदर्द बनता गया। अवाँछित अतिथि की तरह न सिर्फ उसे पनाह मिली, बल्कि नए- नए शहरों में घुमाने के बाद अंत में उसे एक कोने में पटक दिया गया। कहना न होगा कि उसकी यह अंतिम स्थिति किसी नई बहुरिया के विवाह की उत्तरार्ध-कथा है। एक दिन दूकान से सामान मँगवाकर दाम चुका देने के बाद मेरे मुँह से निकला कि रुपयों के बदले चेंज ही दे देती। यह बात मुँह से निकलने की देरी थी कि सामान लाने वाला लड़का इस तरह मुस्काया जैसे बारिश की पहली बौछार के छँटते ही धूप निकल आई हो। छूटते ही बोला-
""कभी भी, कितना  भी ।चिल्लर के लिये कभी भी। जब बुलाओ,हाजिर हो जाऊँगा।"
उस समय तक मुझे  मुम्बई में बहुप्रचलित इस शब्द का  अर्थ नहीं मालूम था। ''चिल्लर'' शब्दमुझे बड़ा ही गँवई महसूस होता था जैसे बहुत दिनों के गँधाते कपड़े पहने कोई आस- पास घूम रहा हो । इसी तरह dollar शब्द से भी मैं अपरिचित थी जो अधिकतर पाँच रुपयों के सिक्के के लिये इस्तमाल होता है। इन दोनों का सिक्कों से क्या सम्बंध है, मुझे मालूम न था।
जैसे बच्चे को मिठाई मिलने की संभावना पर खुशी हो और वह वक्त-बेवक्त हँसता-मुस्कराता दरवाजे से झाँकता रहे, लड़का भी कई चक्कर लगा गया।
इस बीच प्लास्टिक की थैली में रखा सिक्कों का पहाड़ निकाल कर मैं उसे गिनने बैठी। पेन-कागज लेकर हिसाब लिखते समय पाँच के अलग, दो के अलग एक के अलग छोटे-छोटे ढेर बनने लगे। गिनती जाती और रुपयों में तब्दील करती जाती।
काफी देर के बाद मैंने घड़ी की ओर देखा -इस पहाड़ को निपटाने में मुझे डेढ़ घंटे लग चुके थे। शायद इसी को कमरतोड़ परिश्रम कहा गया है। मेरा सिर भन्ना रहा था, रीढ़ की हड्डी और कमर का दर्द बढ़ चुका था और गर्दन अकड़ चुकी थी। इस पार्थिव जगत के साथ अपने संवेदनशील मन को लेकर अंत में जिस प्रकार निरंतर असफलता का सामना होता रहता है, उसी  प्रकार अपने इस हिसाब की माथापच्ची में भी समय गुजरता गया।
महानगर की नन्हीं सी बाल्कनी में आने वाली धूप आई भी और चली भी गई - पता ही नहीं चला। मेरे अथक प्रयास और परिवार के अन्य सदस्यों की नुक्ताचीनी के बावजूद वहाँ गमलों में बड़ी शान से अपने अस्तित्व का हर्षपूर्वक प्रदर्शन करते - मेरे सुख-दुख के साथी कुछ गिने- चुने फूलों पर रंग-बिरंगी तितली आई भी और चली भी गई। मेरी पसंदीदा-हल्दी के रंगों वाली चिड़िया-जिसे बंगाल में उसके रंग के कारण'"बोनिकेर बोऊ"-अर्थात-बनिए की बहू-कहकर पुकारा जाता है, नाराज होकर बिना दर्शन  दिए चली गई।धूप में मरकत-मणि की तरह झिलमिलाती इस चित्र-विचित्र दुनिया की पुस्तक का एक भी पन्ना न मैं ने उलटा, न पढ़ा - मेरा वह दिन अकारथ ही रहा।
लड़के के चले जाने के बाद मैंने इस चिल्लर-प्रसंग पर मनन किया। अचानक अंधेरे में जैसे बिजली चमक जाए, लगा कि चिल्लर और दुख एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।
इस आप्त ज्ञान के बाद जो कुछ समझ में आया, वह यह था-जिस तरह चिल्लर धीरे-धीरे जमा होकर पहाड़ बन जाता है,दुखों की तहें भी छाती में बैठ जाती हैं। तब मनुष्य को रोज- रोज उन्हें गिनते रहने की आदत सी हो जाती है। इस ढेर के सामने आदमी का वजूद छोटा पड़ जाता है। उचित-अनुचित सभी जगहों पर उनका वर्चस्व हो जाता है।
इन सलवटों को उलटना-पुलटना ही एकमात्र काम हो जाता है।यह एक नशे की तरह है, जिसमें इंसान की कमर भले ही दुख जाये, आँखें थक जायें, पीठ अकड़ जाये, वह ऐसा करने से बाज नहीं आ सकता। इन चिल्लरों को गिने बिना उसे संतोष-धन प्राप्त नहीं होता।
और अंत में दुखों के सिक्के गिनने हों तो जीवन के सौंदर्य-पक्ष की ओर ध्यान कहाँ जाता है? कोयल कूकती रहे, धूप सोना बिखेरती रहे, मौसम गुनगुनाता रहे - सुखों के फूलों को चुनने की किसे फुरसत है! इसलिए अच्छा है कि समय-समय पर इन  चिल्लरों को खर्च कर डालें।

वीणा सिंह












Saturday, January 14, 2012

आदमी और जानवर की कहानी

सुरसुरी चुहिया ने धीरे से बाउँडरी वाल से झाँका तो उसे दो आदमियों के जोर-जोर से लड़ने की आवाज सुनाई दी ।तेज-तेज आवाज में बोलते-बोलते एक का गुस्सा इतना बढ़ गया कि वह जोर से चिल्लाया-जानवर कहीं के!
सुरसुरी अंदर ही अंदर गुस्से से पागल हो गई- इतनी हिम्मत !इतनी बेइज्जती! यह बात तो सबको बतानी ही होगी ।आखिर इससे शर्मनाक बात तो हो ही नहीं सकती कि कोई आदमी जानवरों को "जानवर "कह के पुकारे!आखिर कुत्तों और घोड़ों के भी नाम होते हैं- Tommy, Turbo, Volto, Booster, Hardy,Sturdy,Brandy........और जाने क्या-क्या!पर कोई उन्हें "जानवर" कह के तो नहीं पुकारता ।
गुस्से से उफनती हुई वह बाउंड्री वाल से उतरी और  थोड़ी दूर पर अंदर ही अंदर बनी सुरंग से होती हुई जंगल में पहुँची।शुक्र है,अभी तक इस गुप्त रास्ते के बारे में कोई नहीं जानता।कहीं पता लग जाये तो मेरी शामत आई समझो!
जंगल और शहर पास-पास तो थे,लेकिन कुछ दिनों से दोनों के बीच एक लकीर खिंच गई थी।  इधर आदमी ज्यादा से ज्यादा अमीर  होता गया, साथ ही घमंडी भी। जानवरों को भी लगा कि पहले जैसी इज्जत उन्हें आदमी देता था, अब वैसा नहीं रहा।
इस तरह पास की नदी की दोनों ओर का हिस्सा बँट गया। एक तरफ शहर और दूसरी तरफ जंगल ।

शेरा शेर ने सबसे कह दिया कि अब सिर्फ खा-पीकर, आँखें मिचमिचा कर लँबी तानना उचित नहीं। अब वह सलमान Bodyguard  बनकर दिखाएगा। उसकी एक दहाड़ से आदमी पिद्दी बन जायेगा। लम्बू जिराफ उसकी मदद को आगे आया।अपनी लम्बी गर्दन उठा वह दूर-दूर तक देख कर बता सकता था कि दुश्मन कहाँ है। जम्बो हाथी सबसे दुखी था। अब तक शहर के मंदिरमें गणपति बप्पा के चरणों में बैठकर वह उन्हें शत-शत नमस्कार करता। आजकल नदी के जल में घुसकर घंटों उन्हीं दिनों के बारे में सोचना ही उसका टाइमपास था।
मि.और मिसेज.बुल अपने परिवार में व्यस्त थे। पहले देश-विदेश में उनका नाम था। व्हाइ दिस कोलावरी -गाने में तो उन्हें होली काउ कह कर सम्मान दिया गया था।

कालू भालू चिड़ियाघर से छूट आया था-ऐसे भी वहाँ वह उदास रहता था। दिन भर शहरी बच्चे उसे पत्थर मारते,यहाँ आकर उसे शाँति मिली।
सुन्दर बंदर को शहर में fridge से फल निकाल कर खाने की आदत पड़ गई थी। यहाँ आकर वह डालों पर झूलता, कलाबाजियाँ दिखाता और ताजे फलों का नाश्ता करता।
बादलों के घिरते ही सतरंगी मोरनी अपने पंखों को फैलाये नाचती तो रंग-बिरंगे पंछी जुट जाते-इंद्रधनुष का पर्दा तन जाता, तरह-तरह की मीठी तान
सुनाते पक्षी ऐसी औरकेस्ट्रा बजाते कि बस जंगल में मंगल हो जाता।
एक दिन सुरसुरी शहर से खबर लाई कि दिवारों पर पोस्टर चिपके हैं और कोई मेजिनी सर्कस के आने की धूमधाम है। इसमें केवल आदमी काम करेंगे,
कालू, लम्बू, जम्बो, सुंदर......किसी को नहीं बुलाया जायेगा।ऊँची तार पर चलने वाला भी आदमी, बच्चों की साइकिल चलाने वाला भी आदमी, चारों ओर आदमी ही आदमी!

थोड़ीदेर को सन्नाटा छा गया। पिछली बार का सर्कस इतना बढ़िया था कि क्या कहें? बच्चे तो रोज भागे चले आते। अब क्या होगा!

मेजिनी सर्कस आया भी, लगा भी और कुछ दिन चला भी लेकिन लोगों को बड़ी निराशा हुई -अगर आदमी ही साइकिल चलाये तो नया क्या है!रास्ते पर भी यही रोज दिखता है-मजा तो तब है,जब सुंदर सीटियाँ मारे, कालू प्लेटें उछाले, जम्बो बड़ी सी गेंद पर बैठ कर लुढ़के! बच्चों का चेहरा लटक गया, सर्कस पूरी तरह फ्लाप हो गया।
धीरे-धीरे आदमी की समझ में आ गया कि जंगल के उस पार के प्राणी उनसे बेहतर, बुद्धिमान और सभ्य हैं।वे उन्हें बहुत मिस कर रहे थे-सुबह उठते ही कोयल की कूक ,इग्रेट की gurgle sound..........जाने कहाँ खो गये थे!
पता नहीं, दोनों का झगड़ा कब खतम होगा! जिस दिन ऐसा हो जाये, लंबू, शेरा कालू, सुंदर के चेहरे उदास नहीं होंगे। उनकी आँखों में आँसू नहीं होंगे। शायद किसी दिन आदमी को अक्ल आ जाये!

वीणा सिंह

बोर मचाए शोर



एक बोर था।बोर के मन मेँ बड़ा शोर था। करवट बदलता,टाँगेँ उछालता,आइने मेँ अलग-अलग तरह के चेहरे बनाता, कभी सिर के बल खड़ा हो जाता,कभी हवा मेँ तलवार भाँजता। उसे सारी आवाजेँ कुछ ज्यादा ही जोर से सुनाई देतीं- हवा बहती तो लगता,नदी गरज रही है। जब लोग बातें करते,वह समझता कि कोई उसे डाँट रहा है।आसमान मेँ एक टुकड़ा बादल दिखते ही वह भाग कर कमरा बंद कर लेता। कभी- कभी तो उसे एहसास होता कि बारिश ने उसे पूरा भिगो दिया है । पेड़ के पत्तोँ मेँ हलचल होते ही उसका दिल धड़क जाता। कभी-कभी वह बहुत दुखी हो जाता- यह कौन सा डर है, जो उसे परेशान करता है! आखिर और भी तो लोग हैं, उसके आस-पास जो हँसते-खेलते,मुस्कराते-चहचहाते हैं! धीरे-धीरे वह उदास रहने लगा।वह फूलों की ओर देखता,पर वे बेजान दिखते- रंग ,न रूप ।उसका कोई साथी न था।उसके मुँह बनाकर घूमने की आदत के कारण सब उससे चिढ़े रहते।वह खुद भी अपने-आप से परेशान हो जाता,सोचता-पता नहीं क्या बात है,सब मुझसे नाराज रहते हैं!
उसकी हालत दिन पर दिन बिगड़ने लगी,चेहरा पीला पड़ने लगा,उसके स्वास्थ्य पर असर दिखाई देने लगा।
एक दिन उसने सोचा-मैं अपने-आप से खुश नहीं और लोग भी मेरे करीब नहीं आते।मुझे इसका कोई हल ढूँढना होगा।वह घर के बाहर के बगीचे में नरम घास पर बैठ गया ।अचानक उसकी निगाह अपने चारों ओर पड़ी-थोड़ी देर को उसे लगा कि वह कोई सपना देख रहा है।
चारों ओर चम-चम करती धूप खिली थी,गुलाब के फूलों पर उसकी चमक उसे और कोमल बना रही थी। अनार के पेड़ लाल फलों से लदे हुए थे,भँवरे गुन-गुन करते उड़ रहे थे,बिजली के तारों से होकर गुजरती हवा उसमें धीमे स्वर में रागिनी उत्पन्न कर रही थी,मैना पुकार रही थी और हरे-नीले पहाड़ी तोते उड़ते हुए आसमान में रंगों की लकीरें खींच रहे थे। बोर ने आँखें मूँद लीं,उसे नशा छा गया-आह! दुनिया कितनी सुन्दर है! ने इसे देखा ही नहीं।
वह मुस्कराया।वह उठा,उसका मन नाच उठा।घर में आकर आइने के सामने अपना चेहरा देखा-वह हँसा,उसका चेहरा चमकने लगा।उसने समझ लिया अब उसे किसी बात का डर नहीं।तभी किसी ने उसका नाम लेकर पुकारा-उसके दोस्त-चुन्नु,मुन्नु उसे खोजते उसके घर आ पहुँचे थे।उसका चेहरा खिल उठा। वह दोस्तों के साथ अपनी दुनिया में खो गया।

 वीणा सिंह









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Tuesday, January 10, 2012

बंजारा राहिल

बहुत अकेला था वह पंछी
उड़ता-उड़ता,मारा-मारा
ऊपर उड़ते काले बादल
नीचे बहता पानी खारा
यहाँ-वहाँ आते-जाते वह
जाने क्या-क्या सोचा करता
ऊन के उलझे गोले सा वह
यहाँ-वहाँ पर डोला करता
पेड़ से टूटी टहनी ले ली
सूरज से ले लिया अंगारा
डाली से कुछ फूल उठाए
फिर भी मन था एक बंजारा
रात कहानी तो मीठी थी
भोर भये नमकीन भई क्यों?
हँसी-हँसी में बातें कहती
आँखें फिर गमगीन भईं क्यों?


वीणा सिंह